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Friday, 16 March 2018

CTET Solved Paper 21/2/2016 (भाग I बाल विकास एवं शिक्षा-शास्त्र)



निर्देश (प्र.सं. 1-30) निम्नलिखित प्रश्नो के उत्तर देने के लिए सही/ सबसे उपयुक्त विकल्प चुनकर निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिये -


1. अपने चिन्तन में अवधारणात्मक परिवर्तन लाने हेतु शिक्षार्थियो को सक्षम बनाने के लिए शिक्षिका को

क. उन बच्चों को परुस्कार देना चाहिए जिन्होंने अपने चिन्तन में परिवर्तन किया है

ख. बच्चों को स्वयं चिन्तन करने के लिए हतोत्साहित करना चाहिए और उनसे कहना चाहिए कि वे शिक्षिका को सुने और उसका अनुपालन करें।

ग. व्याख्यान के रूप में व्याख्या प्रस्तुत करनी चाहिए।

घ. स्पष्ट और आश्वस्त करने वाली व्याख्या देनी चाहिए तथा शिक्षार्थियों के साथ चर्चा करना चाहिए

उत्तर घ. यदि कोई शिक्षक अपने शिक्षार्थियों के चिन्तन में अवधारणात्मक परिव्रतन लाने हेतु उन्हें सक्षम बनाना चाहता है, तो शिक्षक को चाहिए कि वह स्पष्ट और आश्वस्त करने वाली व्याख्या दे तथा शिक्षार्थियों के साथ चर्चा करे।


2. प्राथमिक विद्यालय के कक्षा-कक्ष के सन्दर्भ में सक्रियबद्धता का क्या अर्थ है ?

क. याद करना, प्रत्यास्मरण और सुनाना

ख. शिक्षक का अनुकरण और नकल करना

ग. जाँच-पड़ताल करना, प्रशन पूछना और वाद-विवाद

घ. शिक्षक द्वारा दिए गए उत्तरों को नकल करना

उत्तर ग


3. बच्चे तब सर्वाधिक सृजनशील होते है जब वे किसी गतिविधि में भाग लेते है

क. शिक्षक की डाँट से बचने के लिए

ख. दूसरों के सामने अच्छा करने के दबाव में आकर

ग. अपनी रूचि से

घ. पुरस्कार के लिए

उत्तर ग. बच्चे स्वयं बेहतर तरीके से सीखते है और तब वे ज्यादा सृजनशील होते है, जब किसी गतिविधि  को स्वयं की रूचि से करते है।


4. भारत में अधिकांस कक्षाएँ बहुभाषी होती है और इसे शिक्षक द्वारा ........................... के रूप में देखा जाना चाहिए ।

क. परेशानी

ख. समस्य़ा

ग. संसाधन

घ. बाधा

उत्तर ग. बहुभाषिता, भारते के भाषा-परिदृश्य का एक विशिष्ट लक्षण है। एक शिक्षक को चाहिए कि वह इसका उपयोग एक संसाधन के रूप में करे।


5. शिक्षार्थियों द्वारा की गई गलतियाँ और त्रुटियाँ

क. बच्चों को कमजोर अथवा उत्कृष्ट चिन्हित करने के अच्छे अवसर है

ख. शिक्षक और शिक्षार्थियों  की असफलता के सूचक है

ग. उनके चिन्तन को समझने के अवसर के रूप में देखी जानी चाहिए

घ. कठोरता से निपटाई जानी चाहिए

उत्तर ग. शिक्षार्थियों द्वारा की जाने वाली गलतियों और त्रुटियों को उनके चिन्तन को समझन के अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए.


6. ............................ के विचार से बच्चे सक्रिय ज्ञान-निर्माता तथा नन्हें वैज्ञानिक है, जो संसार के बारे में अपने सिद्धान्तों की रचना करते है।

क. स्किनर

ख. पैवलाॅव

ग. युंग

घ. पियाजे

उत्तर घ.


7. बाल-केन्द्रित शिक्षा-शास्त्र का अर्थ है

क. बच्चों को नैतिक शिक्षा देना

ख. बच्चों को शिक्षक का अनुगमन और अनुकरण करने के लिए कहना

ग. बच्चों की अभिव्यक्ति और उनकी सक्रिय भागीदारी को महत्व देना

घ. बच्चों को पूर्ण रूप से स्वतन्त्रता देना

उत्तर ग. बाल-केन्द्रित शिक्षा-शास्त्र से हमारा तात्पर्य बच्चो की अभिव्यक्ति और उनकी सक्रिय भागीदारी को महत्व देने से है।


8. जटिल परिस्थिति को संसाधित करने में शिक्षक बच्चों की सहायता कर सकता है

क. प्रतियोगिता को बढ़ावा देकर और सबसे पहले कार्य पूरा करने वाले बच्चे को पुरस्कार देकर

ख. कोई भी सहायता न देकर, जिससे बच्चे अपने आप निर्वाह करना सीखे

ग. उस पर एक भाषण देकर

घ. कार्य को छोटे हिस्सों में बाँटने के बाद निदद्रश लिखकर

उत्तर घ. जटिल परिस्थिति को संसाधित करने में शिक्षक कार्य को छोटे हिस्सों में बाँटने के बाद निर्देश लिखर बच्चों की सहायता कर सकता है।


9. शिक्षार्थियों से यह अपेक्षा करना कि वे ज्ञान को उसी रूप में पुन: प्रस्तुत कर देंगे जिस रूप में उन्होंने उसे ग्रहण किया है

क. अच्छा है, क्योकि यह शिक्षक के लिए आकलन में सरल है

ख. एक प्रभावी आकलन युक्ति है

ग. समस्यात्मक है, क्योंकि व्यक्ति अनुभवों की व्याख्या करते है और ज्ञान को ज्यों का त्यों पुन: उत्पादित नहीं करते

घ. अच्छा है, क्योंकि जो भी हमारे मन में है हम उसे रिकार्ड करने लगते है

उत्तर ग


10. जब शिक्षार्थियों को समूह में किसी समस्या पर चर्चा का अवसर दिया जाता है, तब उनके सीखने का वक्र

क. बेहतर होता है

ख. स्थिर रहता है

ग. अवनत होता है

घ. समान रहता है

उत्तर क. जब शिक्षार्थियों को समूह में किसी समस्या पर चर्चा का अवसर दिया जाता है, तब उनके सीखने का वक्र बेहतर होता है।


11. विकास की गति एक व्यक्ति से दूसरे मे भिन्न होती है, किन्तु यह एक ........ नमूने का अनुगमन करती है

क. एड़ी-से-चोटी

ख. अव्यवस्थित

ग. अप्रत्याशित

घ. क्रमबद्ध और व्यवस्थित

उत्तर घ.


12. विकास के लिए निम्नलिखित में से कौन-सा एक उचित है -

क. विकास जन्म के साथ प्रारम्भ होता है और समाप्त होता है

ख. सामाजिक-सांस्कृतिक सन्दर्भ विकास में एक महत्वपूर्ण भमिका का निर्वाह करता है

ग. विकास एकल आयामी है

घ.  विकास पृथक होता है।

उत्तर ख.


13. व्यक्तियों में एक-दूसरे से भिन्नता क्यो होती है ?

क. वातावरण के प्रभाव के कारण

ख. जन्मजात विशेषताओं के कारण

ग. वंशानुक्रम और वातावरण के बीच अन्योन्यक्रिया के कारण

घ. प्रेतेयेक व्यक्ति को उसके माता-पिता से जीनों का भिन्न समुच्चय प्राप्त होने के कारण

उत्तर ग. वंशानुक्रम जहाँ हमें विकसित होने की क्षमता प्रदाना करता है वही वातावरण इन क्षमताओं को विकसित होने के अवनसर प्रदान करता है। अत: व्यक्तियों में  एक-दूसरे से भिन्नता वंशानुक्रम और वातावरण के बीच अन्योन्यक्रिया के कारण होती है।


14. बच्चे के समाजीकरण में परिवार ........................ भूमिका निभाता है

क. कम महत्वपूर्ण

ख. रोमांचकारी

ग. मुख्य

घ. गौण

उत्तर ग. बच्चे के समाजीकरण में परिवार एक मुख्य भूमिका निभाता है। अनेक मनोवैज्ञानिकों का मत है कि परिवार ही वह पहली संस्था है, जो बच्चे को शिष्टाचार एवं नैतिक विकास की शिक्षा देकर उसे योग्य व्यक्ति बनाता है।


15. निम्नलिखित में से कौन-सा एक सही मिलान वाला जोड़ा है ?

क. मूर्त संक्रियात्मक बच्चा    -     साधारण एवं वर्गीकरण करने योग्य

ख. औपचारिक सक्रियात्मक बच्चा    - अनुकरण प्रारम्भ, कल्पनापरक खेल

ग. शैशवास्था                    -        तर्क का अनुप्रयोग और अनुमान लगाने से सक्षम

घ. पूर्वसंक्रियात्मक बच्चा      - निगमनात्मक विचार

उत्तर क.


16. एक बच्ची कहती है, "धूप में कपड़े जल्दी सूख जाते है।" वह ........... की समझ को प्रदर्शित कर रही है।

क. प्रतीकात्मक विचार

ख. अहकेन्द्रित विचार

ग. कार्य-कारण

घ. विपर्यय चिन्तन

उत्तर ग


17. पियाजे के अनुसार, बच्चों का चिन्तन वयस्कों से ...................    में भिन्न होता है बजाय ............ के।

क. मात्रा, प्रकार

ख. आकार, मूर्तपरकता

ग. प्रकार, मात्रा

घ. आकार, किस्म

उत्तर - ख


18. निम्नलिखित में से कौन सा एक आधारभूत सहायता का उदाहरण है ?

क. अनुबोधन और संकेत देना तथा नाजुक स्थितियों पर प्रश्न पूछना

ख. शिक्षार्थियों को प्रेरित करने वाले भाषण देना

ग. प्रश्न पूछने को बढ़ावा दिए बिना स्पष्टीकरण देना

घ. मूर्त और अमूर्त दोनो प्रकार के उपहार देना

उत्तर क . अनुबोधन और संकेत देना तथा नाजुक स्थितियों पर प्रश्न पूछना, आधारभूत सहायता के उदाहरण है।


19. वाइगोत्स्की के अनुसार, बच्चे सीखते हैं

क. जब पुनर्बलन प्रदान किया जाता है

ख. परिपक्व होने से

ग. अनुकरण से

घ. वयस्कों और समवयस्कों के साथ परस्पर क्रिया से

उत्तर घ. वाइगोत्स्की का विचार था कि बच्चे, व्यस्कों और समवयस्कों के साथ परस्पर क्रिया से सीखते है।


20. कोलबर्ग ने प्रस्तुत किए है

क. संज्ञानात्मक विकास के चरण

ख. शारीरिक विकास के चरण

ग. संवेगात्मक विकास के चरण

घ. नैतिक विकास के चरण

उत्तर घ. कोलबर्ग द्वारा नैतिक विकास के चरण प्रस्तुत किए गए है। उन्होंने अपने नैतिक विकास सिद्धान्त को तीन स्तरों तथा छह चरणों प्रत्येक स्तर को दो-दो चरणों में बाँटकर अध्ययन किया है।


21. निम्नलिखित में से कौनृसी स्थिति बालकेन्द्रित कक्षा-कक्ष को प्रदर्शित कर रही है ?

क. एक कक्षा जिसमें शिक्षीका नोट लिखा देती है और शिक्षार्थियो से उन्हें याद करने को कहा जाता है।

ख. एक कक्षा जिसमें पाठ्य-पुस्तक एकमात्र संसाधन होता है जिसका सन्दर्भ शिक्षिका देती है।

ग. एक कक्षा जिसमें शिक्षार्थी समूहों में बैठे है और शिक्षिका बारी-बारी से प्रत्येक समूह में जा रही है।

घ. एक कक्षा जिसमें शिक्षार्थियों का व्यवहार शिक्षिका द्वारा दिए जाने वाले पुरस्कार और दण्ड से संचालित होता है।

उत्तर ग.


22. बुद्धि है ?

क. सामर्थ्यों का एक समुच्चय

ख. एख अकेला और जातीय विचार

ग. दूसरों के अनुकरण करने की योग्यता

घ. एक विशिष्ट योग्यता

उत्तर क


23. भाषा विकास के लिए प्रारम्भिक बचपन ............ काल है ।

क. कम महत्वपूर्ण

ख. अमहत्वपूर्ण

ग. अतिसंवेदनशील

घ. निरपेक्ष

उत्तर ग


24. एक सहशिक्षा कक्षा में लड़को से सिक्षक यह कहता है, "लड़के बनो और लड़कियों जैसा व्यवहार मत करो।" यह टिप्पणी

क. जातीय भेद-भाव की परिचायक है

ख. लड़के-लड़कियों के साथ व्यवहार का एक अच्छा उदाहरण है

ग. लड़के-लड़कियों में भेद-भाव की रूढ़िबद्ध धारणा प्रकट करती है

घ. लड़कियों पर लड़कों की जीववैज्ञानिक महत्ता को उजागर करती है।

उत्तर ग. दिया गया कथन लड़के-लड़कियों में भेद-भाव की रूढ़िबद्ध धारणा प्रकट करती है।


25. आकलन

क. बच्चों को लेबल करने (नाम देने ) और वर्गीकृत करने की अच्छी रणनीति है

ख. बच्चों में प्रतियोगातात्मक भावना को सक्रिय रूप से बढ़ावा देना है

ग. सीखने को सुनिश्चित करने के लिए तनाव और दबाव को उत्पन्न करना है

घ. सीखने में सुधार का एक तरीका है

उत्तर घ. राष्ट्रीय पाठ्यचर्चा की रूपरेखा ( एनसीएफ ) 2005 के अनुसार, आकलन का प्रयोजन निश्चय ही सीखने-सिखाने की प्रक्रियाओं एवं सामग्री में सुधार लाना है। अत: आकलन सीखने में सुधार का एक तरीका है।


26. निम्नलिखित में से कौन-सा एक कथन  'समावेशन' का सबसे अच्छा वर्णन करता है ?

क.  यह एक विश्वास है कि बच्चों को अपनी योग्यताऔं के अनुसार अलग किया जाना चाहिए।

ख.  यह एक विश्वास है कि कुछ बच्चे कभी कुछ सीख ही नहीं सकते।

ग.   यह एक दर्शन है कि सभी बच्चों को नियमित विद्यालय प्रणाली में समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।

घ. यह एक दर्शन है कि विशेष बच्चे ईश्वर के विशेष उपहार है।

उत्तर ग. समावेशन एक दर्शन है कि सभी बच्चों को नियमित विद्यालय प्रणाली में समान शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है।


27. 'वंचित वर्ग' की पृष्ठभूमि के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षक को चाहिए कि

क. उन्हें बहुत-सा लिखित कार्य दे

ख. उनके बारे में अधिक जानकारी जुटाने का प्रयास करे और उन्हें कक्षा में होने वाली चर्चा में शामिल करे

ग. उन्हें कक्षा में अलग बिठाएँ

घ. उन पर ध्यान न दे, क्योंकि वे दूसरे शिक्षार्थियों के साथ अन्त:क्रिया नहीं कर सकते

उत्तर ख. 'वंचित वर्ग' की पृष्ठभूमि के बच्चों को शिक्षा प्रदान करने के लिए शिक्षक को चाहिए कि उनके बारे में अधिक जानकारी जुटाने का प्रयास करें तथा उन्हें कक्षा में होने वाली चर्चाओं में शामिल करें।


28. निम्नलिखित में से कौन-सा व्यवहार बच्चे की अधिगम-निर्योग्यता की पहचान करता है ?

क. मनोभाव का जल्दी-जल्दी बदलना ( मूड स्विंग्स )

ख. अपमानजनक व्यवहार

ग.  b को d, was को saw, 21 को 12 लिखना

घ. कम अवधान-विस्तार और उच्च शारीरिक गतिविधि

उत्तर क


29. एक बच्चा जो आंशिक रूप से देख सकता है

क. बिना किसी विशेष प्रावधान के उसे 'नियमित' विद्यालय में डालना चाहिए

ख. उसे शिक्षा नहीं देनी चाहिए, क्योंकि वह उसेक किसी काम नहीं आएगी

ग. उसे अलग संस्थान में डालने की आवश्यकता है

घ. विशेष प्रावधान करते हुए उसे नियमित विद्यालय में रखना चाहिए

उत्तर घ.


30. सीखना

क. सीखने वाले के संवेगों से प्रभावित नहीं होता है

ख. संवेगों से क्षीण सम्बन्ध रखता है

ग. सीखने वाले के संवेगों से स्वतन्त्र है

घ. सीखने वाले संवेगों से प्रभावित होता है

उत्तर घ

Friday, 1 September 2017

संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत क्या है?


संज्ञान विचार, अनुभव और ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से ज्ञान प्राप्त करने और चीजों को समझने की मानसिक प्रक्रिया है। इसके माध्यम से हमारे मन में विचार पैदा होते हैं और किसी चीज के बारे में पूर्वानुमान भी लगा पाते हैं। मनोविज्ञान में संज्ञान का काफी महत्व है।
संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत में संज्ञान का काफी विस्तृत अध्ययन किया जाता है।संज्ञानात्मक शब्द का अंग्रेजी रूपांतरण है कॉगनेटिव। हमारी ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से हम वाह्य जगत तो जानने समझने की जो कोशिश करते हैं उसे ही संज्ञान कहते हैं। संज्ञान का अर्थ है जानना। इसको विशेष महत्व देने वाले मनोवैज्ञानिकों ने संज्ञानावादी समूह का निर्माण किया।
इसके अनुसार व्यक्ति अपने वातावरण एवं परिवेश के साथ मानसिक शक्तियों का प्रयोग करते हुए सीखता है। इसके संस्थापक स्विटजरलैंड के मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे माने जाते हैं। उन्होंने संज्ञानात्मक विकास के सिद्धांत का प्रतिपादन मनोविज्ञान में किया। इसके अनुसार सीखना उस समय ज्यादा अर्थपूर्ण होता है जब वह विद्यार्थी की रुचि और जिज्ञासा के अनुरूप हो।

संज्ञात्मक विकास क्या है

जीन पियाजे का मानना है कि संज्ञानात्मक विकास अनुकरण की बजाय खोज पर आधारित है। इसमें व्यक्ति अपनी ज्ञानेंद्रियों के प्रत्यक्ष अनुभव के आधार पर अपनी समझ का निर्माण करता है। उदाहरण के तौर पर कोई छोटा बच्चा जब जलते हुए दीपक को जिज्ञासावश छूता है तो उसे जलने के बाद अहसास होता है कि यह तो डरावनी चीज़ है, इससे दूर रहना चाहिए। उसके पास अपने अनुभव को व्यक्त करने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं होते पर वह जान लेता है कि इसको दूर से देखना ही ठीक है। वह बाकी लोगों की तरफ इशारा करता है अपने डर को अभिव्यक्ति देने वाले इशारों में।
इसके साथ ही दूसरी प्रक्रिया भी साथ-साथ चलती है जिसे व्यवस्थापन व संतुलन कहते हैं। इसमें नई वस्तु व विचार के समायोजन की प्रक्रिया होती है। इस तरह का समायोजन आजीवन चलने वाली प्रक्रिया है। वर्तमान दौर में बदलाव की रफ्तार काफी तेज़ है, ऐसे में यह प्रक्रिया बेहद अहम हो जाती है। मनोविज्ञानिक नजरिये से पूरी प्रक्रिया को समझना हमें व्यक्तियों के व्यवहार को समझने में मदद करता है।इस प्रकार का सीखना सक्रिय रूप से सीखना होता है। इसके व्यक्ति अपने परिवेश और वातावरण के साथ सक्रिय रूप से अंतर्क्रिया करता है। इसमें किसी कार्य को करते हुए व्यक्ति किसी एक विचार में नए विचारों को शामिल करता है। उससे उसका स्पष्ट जुड़ाव देख और समझ पाता है। इस प्रक्रिया को सात्मीकरण या फिर assimilation कहते हैं।

संज्ञानात्मक विकास की अवस्थाएं

पियाजे के अनुसार विकास की अवस्थाएं क्रमिक होती हैं
  1. संवेदी प्रेरक अवस्था – जन्म से 2 वर्ष तक यह अवस्था चलती है। इसमें बच्चे का शारीरिक विकास तेजी से होता है। उसके भीतर भावनाओं का विकास भी होता है।
  2. पूर्व संक्रियात्मक अवस्था – जन्म से 7 वर्ष तक। इस अवस्था में बच्चा नई सूचनाओं व अनुभवों का संग्रह करता है। इसी अवस्था में बच्चे में आत्मकेंद्रित होने का भाव अभिव्यक्ति पाता है। पियाजे कहते हैं कि छह साल के कम उम्र के बच्चे में संज्ञानात्मक परिपक्वता का अभाव पाया जाता है।
  3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था – यह सात से 11 वर्ष तक चलती है। इस उम्र में बच्चा विभिन्न मानसिक प्रतिभाओं का प्रदर्शन करता है। उदाहरण के दौर पर पहली कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे ने तोते से जुड़ी एक कविता सुनी जिसमें डॉक्टर तोते को सुई लगाता है और तोता बोलता है ऊईईई…। यह सुनकर पहली कक्षा में पढ़ने वाले बच्चे ने कहा, “यह तो झूठ है। डॉक्टर तोते को सुई थोड़ी ही लगाते हैं।“ यहाँ एक छह-सात साल का बच्चा अपने अनुभवों के आईने में कविता में व्यक्त होने वाले विचार को बहुत ही यथार्थवादी ढंग से देखने की प्रतिभा का प्रदर्शन कर रहा है, जिसे गौर से देखने-समझने की जरूरत है।
  4. औपचारिक-संक्रियात्मक अवस्था – यह अवस्था 11 साल से शुरू होकर प्रौढ़ावस्था तक जारी रहती है। इस अवस्था में बालक परिकल्पनात्मक ढंग से समस्याओं के बारे में विचार कर पाता है। उदाहरण के तौर पर सातवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक छात्रा कहती है कि सर ने हमें पढ़ाया कि गांधी के तीन बंदर थे। उनसे हमें सीख मिलती है कि हमें बुरा देखना, सुनना और कहना नहीं चाहिए। मैंने कहा बिल्कुल ठीक है। इस उम्र के बच्चे भी सुनी हुई बातों पर सहज यकीन कर लेते हैं। फिर बात हुई कि बग़ैर देखे हमें कैसे पता चलेगा कि सही और ग़लत क्या है, यही बात सुनने के संदर्भ में लागू होती है। बोलने के संदर्भ में हम एक चुनाव कर सकते हैं मगर वह पहले की दो चीज़ों के बाद ही आती है। यानि हमें अपने आसपास के परिवेश को समझने के लिए अपनी ज्ञानेंद्रियों का प्रयोग करना चाहिए ताकि हम समझ सकें कि वास्तव में क्या हो रहा है और सही व गलत का फैसला हम तभी कर सकते हैं।

जानें शिक्षा मनोविज्ञान का अर्थ क्या है?

शिक्षा मनोविज्ञान दो शब्दों से मिलकर बना है, शिक्षा और मनोविज्ञान। मनोविज्ञान को मानसिक प्रक्रियाओं, अनुभवों और व्यवहार के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में परिभाषित किया जा सकता है। वहीं शिक्षा को इंसान के व्यक्तित्व के सर्वांगीण (शारीरिक, संज्ञानात्मक, भावनात्मक और सामाजिक विकास) के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।
इस अर्थ में शिक्षा मनोविज्ञान बच्चों व बड़ों के मनोविज्ञान को शिक्षा के संदर्भ में व्यावहारिक रूप से प्रयोग करने के लिए सैद्धांतिक जमीन मुहैया करवाता है जिसके आधार पर अधिगम, प्रेरणा, व्यक्तित्व विकास और बाल मनोविज्ञान के विभिन्न विषयों पर एक समग्र समझ का निर्माण करने की कोशिश होती है।

शिक्षा क्या है?

अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिक्षा का अर्थ मनुष्य की आंतरिक शक्तियों को बाहर की तरफ आने के लिए प्रेरित करना। जॉन एडम्स के मुताबिक प्राचीन काल में शिक्षा शिक्षक केंद्रित थी। जिसके दो छोर थे, शिक्षक और शिक्षार्थी। बाद में जॉन डिवी ने शिक्षा को बालकेंद्रित बताते हुए इसके तीन केंद्रों का जिक्र किया। जो क्रमशः शिक्षक, शिक्षार्थी और पाठ्यक्रम हैं।शिक्षा शब्द संस्कृत के शिक्ष् धातु से बना है जिसका अर्थ है सीखना या सिखाना। यानि इस अर्थ में शिक्षा सीखने-सिखाने की प्रक्रिया है। शिक्षा के लिए विद्या शब्द का भी उपयोग किया जाता है जिसका अर्थ होता है जानना। एजुकेशन शब्द लैटिन भाषा के चार शब्दों से मिलकर बना है जिसका अर्थ है प्रशिक्षित करना, अन्दर से बाहर निकालना, पालन पोषण करना और आंतरिक से वाह्य की तरफ जाना।

शिक्षा की विभिन्न परिभाषाएं

गीता से अनुसार, “सा विद्या विमुक्ते”। यानि विद्या वही है जो बंधनों से मुक्त करे।
टैगोर के अनुसार, “हमारी शिक्षा स्वार्थ पर आधारित, परीक्षा पास करने के संकीर्ण मकसद से प्रेरित, यथाशीघ्र नौकरी पाने का जरिया बनकर रह गई है जो एक कठिन और विदेशी भाषा में साझा की जा रही है। इसके कारण हमें नियमों, परिभाषाओं, तथ्यों और विचारों को बचपन से रटना की दिशा में धकेल दिया है। यह न तो हमें वक़्त देती है और न ही प्रेरित करती है ताकि हम ठहरकर सोच सकें और सीखे हुए को आत्मसात कर सकें।”
महात्मा गांधी के अनुसार, ” सच्ची शिक्षा वह है जो बच्चों के आध्यात्मिक, बौद्धिक और शारीरिक पहलुओं को उभारती है और प्रेरित करती है। इस तरीके से हम सार के रूप में कह सकते हैं कि उनके मुताबिक शिक्षा का अर्थ सर्वांगीण विकास था।”
स्वामी विवेकानन्द के अनुसार, “शिक्षा व्यक्ति में अंतर्निहित पूर्णता की अभिव्यक्ति है।”
अरस्तु के अनुसार, “शिक्षा मनुष्य की शक्तियों का विकास करती है, विशेष रूप से मानसिक शक्तियों का विकास करती है ताकि वह परम सत्य, शिव एवम सुंदर का चिंतन करने योग्य बन सके।”

शिक्षा मनोविज्ञान क्या है?

शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की एक व्यावहारिक शाखा है। मनोविज्ञान के सिद्धांतों का शिक्षण प्रक्रिया में इस्तेमाल करना और शैक्षिक समस्याओं के समाधान में प्रयोग करना शिक्षा मनोविज्ञान के दायरे को परिभाषित करता है।

यानि शिक्षा मनोविज्ञान का संबंध मनोविज्ञान के सिद्धांतों और शिक्षा के सिद्धांतों व समस्याओं दोनों से है। मनोविज्ञान व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन करता है, जबकि शिक्षा में व्यवहार के परिमार्जन व सामाजिकरण के ऊपर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

शिक्षा मनोविज्ञान की परिभाषाएं

क्रो एण्ड क्रो, “शिक्षा मनोविज्ञान व्यक्ति के जन्म से वृद्धावस्था तक सीखने के अनुभवों का वर्णन और व्याख्या करता है।”
कॉलसनिक के अनुसार, “मनोविज्ञान के सिद्धांतों का उपयोग शिक्षा के क्षेत्र में करना शिक्षा मनोविज्ञान कहलाता है।”
स्कीनर के मुताबिक, “शैक्षणिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार का वैज्ञानिक अध्ययन शिक्षा मनोविज्ञान कहलाता है।”
जेम्स ड्रेवर के अनुसार, “शिक्षा मनोविज्ञान, मनोविज्ञान की वह शाखा है जो शिक्षा में मनोवैज्ञानिक सिद्धांतों तथा खोजों के प्रयोग के साथ ही शिक्षा की समस्याओं के मनोवैज्ञानिक अध्ययन से संबंधित है।”
शिक्षा मनोविज्ञान के अध्ययन का केंद्र शैक्षणिक परिस्थितियों में मानव व्यवहार है। इस विज्ञान और कला दोनों श्रेणी में रखा जाता है। इसकी प्रकृति वैज्ञानिक है क्योंकि अध्ययन के लिए वैज्ञानिक विधियों का उपयोग किया जाता है।

Sunday, 11 June 2017

शिक्षा मनोविज्ञान प्रतिपादक अधिगम के सिद्धांत बुद्धि अभिप्रेरणा प्रश्नोत्तरी