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Monday, 3 February 2020

नागरिकता कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास करने वाला चौथा राज्य बना पश्चिम बंगाल

West Bengal becomes 4th state to pass resolution demanding scrapping of CAA


पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 27 जनवरी 2020 को संशोधित नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ राज्य सरकार द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव को पारित कर दिया है। वे ऐसा करने वाला चौथा राज्य बन गया है। पश्चिम बंगाल सरकार ने विधानसभा में यह प्रस्ताव पेश किया था कि विवादास्पद सीएए कानून को निरस्त किया जाए और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर), राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) को वापस लिया जाए।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रस्ताव पर विधानसभा में कहा कि एनपीआर, एनआरसी और सीएए आपस में जुड़े हुए हैं और नया नागरिकता कानून जन-विरोधी है। उन्होंने कहा कि कानून को तत्काल वापस लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सीएए जन विरोधी है और संविधान विरोधी है। यह प्रस्ताव पश्चिम बंगाल के संसदीय कार्य मंत्री पार्थ चटर्जी ने सदन में पेश किया था।


कितने राज्यों ने इस प्रस्ताव को पारित किया?




नागरिकता कानून (सीएए) के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पारित करने वाला पश्चिम बंगाल देश का चौथा राज्य बन गया है। इससे पहले केरल, पंजाब और राजस्थान में इस कानून के खिलाफ प्रस्ताव लाया जा चुका है। उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा ने 06 सितंबर 2019 को एनआरसी के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया था।


केरल, पंजाब और राजस्थान सरकार ने इस कानून पर क्या कहा?

केरल सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून और अन्य नियमों को चुनौती देते हुए कहा था कि यह कानून अनुच्छेद 14, 21 और 25 के तहत मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है तथा यह कानून अनुचित और तर्कहीन है।

पंजाब सरकार ने भी नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरुद्ध सदन में पारित किया। पंजाब सरकार ने इस प्रस्ताव में नागरिकता संशोधन कानून को असंवैधानिक बताते हुए मांग की कि इस कानून को खत्‍म किया जाए।

राजस्थान सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरुद्ध विधानसभा में प्रस्ताव पारित किया था। सरकार ने प्रस्ताव में कहा था कि संसद में हाल ही में पारित किए गए नागरिकता संशोधन कानून का उद्देश्य धर्म के आधार पर अवैध प्रवासियों को अलग-थलग करना है।


नागरिकता कानून पर सुप्रीम कोर्ट

नागरिकता कानून का मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच गया है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर सरकार को जवाब देने हेतु चार हफ्ते का समय दिया है. कोर्ट ने सीएए पर अंतरिम रोक लगाने से भी मना कर दिया है। उसने कहा कि अब इस पर फैसला भी संविधान पीठ ही करेगी। सीएए के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में कुल 143 याचिकाएं दायर की गई हैं। इनमें केरल सरकार की याचिका भी शामिल है जिसमें इस कानून को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की गई है।


पृष्ठभूमि

यह कानून राज्य में सत्तारूढ़ दल तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भाजपा के बीच तकरार का नया विषय बन कर उभरा है। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) में अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से धार्मिक प्रताड़ना के कारण भारत आए गैर-मुस्लिम समुदायों- हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी तथा ईसाई समुदायों के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान किया गया है।

कानून की शुरुआत के पीछे मुख्य उद्देश्य मुस्लिम-बहुल पड़ोसी देशों में उत्पीड़न का सामना करने वाले धार्मिक अल्पसंख्यकों की मदद करना है। अभी भी दिल्ली के शाहीन बाग सहित देश के कई इलाकों में इस कानून के विरुद्ध धरना-प्रदर्शन जारी है

Tuesday, 12 March 2019

भारत पर साइबर युद्ध का खतरा

The threat of cyber war on India (Author : R. Ranjan)


मामला चाहे चीनी-पाकिस्तानी हैकरों का हो या रूसी-कोरियाई हैकरों का, सवाल है कि आखिर वर्चुअल जंग रुकेगी कैसे? इसमें संदेह नहीं है कि दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा क्योंकि सारी जानकारियां कंप्यूटर नेटवर्कों में ही समाई हुई हैं।

भारत में इस तरह के साइबर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। एक आंकड़ा तो 2013 में अमेरिकी पूर्व सैनिक एडवर्ड स्नोडेन ने ही मुहैया कराया था। मार्च 2013 में स्नोडेन ने बताया था कि बाहर बैठे सेंधमारों ने भारतीयों की 6.3 अरब खुफिया सूचनाओं तक पहुंच बना ली थी। हालत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर रक्षा व विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावासों, मिसाइल प्रणालियों, एनआइसी, यहाँ तक कि खुफिया एजेंसी- सीबीआइ के कंप्यूटरों पर भी साइबर हमले कर उनकी जासूसी हो चुकी है।

साइबर स्पेस के खतरों की बात अब काल्पनिक नहीं रह गई है। वर्चुअल आतंकवाद, सेंधमारी और सैन्य व आर्थिक महत्त्व की सूचनाओं के लीक होने जैसी घटनाओं ने साबित कर दिया है कि सूचनाओं के इलेक्ट्रॉनिक संजाल में घुसपैठ की रोकथाम के पुख्ता प्रबंध नहीं करने का खमियाजा दुनिया की कई सरकारों को भी उठाना पड़ सकता है। हाल में, पुलवामा हमले के फौरन बाद खबर मिली कि पाकिस्तानी हैकरों ने भारत सरकार से जुड़ी कम से कम नब्बे वेबसाइटों को हैक कर लिया। इनमें खासतौर से वित्तीय संचालन और पावर ग्रिड से संबंधित वेबसाइटें हैकरों के निशाने पर थीं।

साइबर कहें या वर्चुअल (आभासी) जंग, असल में अब इसका खतरा वास्तविक है। मामला सिर्फ भारत, पाकिस्तान या चीन तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें महाशक्तियां शामिल हैं। पिछले वर्ष अक्तूबर में कई पश्चिमी देशों ने रूस के सैन्य खुफिया विभाग पर दुनियाभर में कई साइबर हमले करने के आरोप लगाए थे। हालांकि रूस ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा था कि कुछ पश्चिमी देश उसे योजनाबद्ध तरीके से फैलाए जा रहे दुष्प्रचार में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं।

इसमें संदेह नहीं रह गया है कि भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती साइबर जंग होगी। साइबर युद्ध यानी इंटरनेट के जरिये संचालित की जाने वाली वे आपराधिक और आतंकी गतिविधियां जिनसे कोई व्यक्ति या संगठन देश-दुनिया और समाज को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे। अभी तक देश में इस तरीके से कई गैरकानूनी काम हुए, जैसे आॅनलाइन ठगी, बैंकिंग नेटवर्क में सेंध, लोगों- खासकर महिलाओं को उनके गलत प्रोफाइल बना कर परेशान करना आदि। साइबर जंग या आतंकवाद का हैकिंग के रूप में भी एक चेहरा ऐसा हो सकता है जिसमें खासतौर से महत्त्वपूर्ण सरकारी वेबसाइटों को निशाना बनाया जाए। भारत में हाल के साइबर हमलों की घटनाओं के बाद यह मांग तक उठने लगी है कि वर्चुअल जंग से दो-दो हाथ करने के मामले में हमारे देश में ठीक वैसा ही रवैया अपनाने की जरूरत है जैसा उड़ी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद हवाई हमले के रूप में अपनाया गया है, यानी साइबर अपराधियों का संपूर्ण सफाया किया जाए। पर यह काम आसान नहीं है।

असल में साइबर युद्ध छेड़ने वाले अपराधियों का चेहरा साफ नहीं दिखता है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठ कर सेंधमार सरकारी प्रतिष्ठानों की वेबसाइटों को चौपट करने के अलावा बैंकिंग से जुड़ी गतिविधियों में सेंधमारी करके अपना उल्लू सीधा कर सकते हैं। जहां तक सरकारी वेबसाइटों को निशाना बनाने की बात है तो ऐसा अक्सर दो देशों के बीच तनाव पैदा होने के हालात में ही सेंधमार करते हैं। ऐसी स्थिति में ये हैकर न सिर्फ सरकारी वेबसाइटों को अपने नियंत्रण में लेकर ठप कर डालते हैं, बल्कि सरकारी दूतावासों, प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों-अधिकारियों के लॉगइन विवरण, ईमेल, पासवर्ड, फोन नंबर और पासपोर्ट नंबर चुरा लेते हैं और उन्हें दूसरी वेबसाइटों पर इस दावे के साथ लीक कर देते हैं कि फलां देश की साइबर सुरक्षा कितनी कमजोर है। खासतौर से भारत की सरकारी वेबसाइटों के बारे में हमारे देश के संदर्भ में हैकिंग की ये कार्रवाइयां बड़ी घटना मानी जाएंगी। इसकी दो अहम वजहें हैं। एक तो यह कि सूचना प्रौद्योगिकी के मामले में भारत खुद को अगुआ देश मानता रहा है, उसके आइटी विशेषज्ञ पूरी दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं और अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थापित सिलीकॉन वैली की स्थापना तक में युवा भारतीय आइटी विशेषज्ञों की भूमिका मानी जाती है।

साइबर खतरों को भांपते हुए सरकार छह साल पहले 2013 में राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति जारी कर चुकी है जिसमें देश के साइबर सुरक्षा के बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए प्रमुख रणनीतियों को अपनाने की बात कही गई थी। इन नीतियों के तहत देश में चौबीसों घंटे काम करने वाले एक नेशनल क्रिटिकल इन्फॉर्मेशन प्रोटेक्शन सेंटर (एनसीईआइपीसी) की स्थापना शामिल है, जो देश में महत्त्वपूर्ण सूचना तंत्र के बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए एक नोडल एज

ekawaz18, [09.03.19 22:14]
ेंसी के रूप में काम कर सके। सवाल है कि क्या इन उपायों को अमल में लाने में कोई देरी या चूक हुई है, अथवा यह हमारे सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र की कमजोर कड़ियों का नतीजा है कि एक ओर सेंधमार जब चाहें, जो चाहें सरकारी प्रतिष्ठानों की वेबसाइटें ठप कर रहे हैं और दूसरी ओर साइबर आतंकी भी अपनी गतिविधियां चलाने में सफल हो रहे हैं?

भारत में इस तरह के साइबर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। एक आंकड़ा तो एडवर्ड स्नोडेन ने ही मुहैया कराया था। मार्च 2013 में स्नोडेन ने बताया था कि बाहर बैठे सेंधमारों ने भारतीयों की 6.3 अरब खुफिया सूचनाओं तक पहुंच बना ली थी। हालत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर रक्षा व विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावासों, मिसाइल प्रणालियों, एनआइसी, यहां तक कि खुफिया एजेंसी- सीबीआइ के कंप्यूटरों पर भी साइबर हमले कर उनकी जासूसी हो चुकी है। यह तथ्य भी प्रकाश में आया है कि विशुद्ध कारोबारी उद्देश्य से भी हमारी संचार सेवाओं को निशाना बनाया जा चुका है। जुलाई 2010 में इनसेट-4बी की बिजली प्रणाली में गड़बड़ी के कारण उसके एक सोलर पैनल ने काम बंद कर दिया था जिससे उसके आधे ट्रांसपॉन्डर ठप हो गए थे। पता चला कि यह काम व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के तहत किया गया था। किसी ने उसमें ‘स्टक्सनेट’ नामक वायरस पहुंचा दिया था, ताकि इनसेट से जुड़े टीवी चैनल चीनी उपग्रह पर चले जाएं! ऐसी ही एक घटना जुलाई, 2015 में हुई थी, जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की व्यावसायिक वेबसाइट ‘एंट्रिक्स’ हैक कर ली गई थी। इस करतूत के पीछे चीन का हाथ माना गया था। ये घटनाएं साबित करती हैं कि अगर कभी दुनिया में साइबर युद्ध के हालात पैदा हुए तो भारत को निशाना बनाना कितना आसान होगा।

बहरहाल, मामला चाहे चीनी-पाकिस्तानी हैकरों का हो या रूसी-कोरियाई हैकरों का, सवाल है कि आखिर वर्चुअल जंग रुकेगी कैसे? इसमें संदेह नहीं है कि दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा क्योंकि सारी जानकारियां कंप्यूटर नेटवर्कों में ही समाई हुई हैं। आज सूचनाओं और जानकारियों का सारा संचालन इंटरनेट के जरिये ही हो रहा है। ऐसी स्थिति में विजेता वही होगा जो दुश्मन के कंप्यूटर नेटवर्क में सेंध लगाने में सक्षम होगा और हैकरों से इंटरनेट पर संचालित की जाने वाली सर्जिकल स्ट्राइक से निपट सकेगा।

जानकारों का मत यह है कि कुछ तकनीकों की वजह से देश से बाहर चल रही गतिविधियों पर निगरानी रखना संभव नहीं हो पाता है, जिसका फायदा विदेशी संगठन और अपराधी-आतंकी उठाने में कामयाब हो जाते हैं। असल मुद्दा विदेशों में स्थित प्रॉक्सी इंटरनेट सर्वर और वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल (वीओआइपी) जैसी तकनीकों की निगरानी का अभाव है। वीओआइपी की पहचान करना और उसके सही पते-ठिकाने की जानकारी लेना काफी मुश्किल काम है। हालांकि राहत की बात यह है कि हमारे देश में वर्ष 2015 में इंटरनेट के जरिये होने वाली आपराधिक गतिविधियों के नियंत्रण के लिए एक विशेष कार्यबल बनाया जा चुका है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर चौबीसों घंटे काम करने वाली कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी-इन), साइबर सुरक्षा के इमरजेंसी रिस्पांस और क्राइसिस मैनेजमेंट के सभी प्रयासों में तालमेल के लिए नोडल एजेंसी बनाने का प्रस्ताव भी किया गया था। राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति में यह प्रस्ताव भी था कि ट्विटर जैसी विदेशी वेबसाइटें किसी भी भारतीय उपभोक्ता से संबंधित सूचनाओं का आवागमन भारत स्थित सर्वरों से ही कर पाएं, अन्यथा नहीं। मुमकिन है कि ये इंतजाम वर्चुअल जंग के हालात पर नियंत्रण करने में हमारी कुछ सहायता कर पाएंगे।

मामला चाहे चीनी-पाकिस्तानी हैकरों का हो या रूसी-कोरियाई हैकरों का, सवाल है कि आखिर वर्चुअल जंग रुकेगी कैसे? इसमें संदेह नहीं है कि दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा क्योंकि सारी जानकारियां कंप्यूटर नेटवर्कों में ही समाई हुई हैं।

भारत में इस तरह के साइबर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। एक आंकड़ा तो 2013 में अमेरिकी पूर्व सैनिक एडवर्ड स्नोडेन ने ही मुहैया कराया था। मार्च 2013 में स्नोडेन ने बताया था कि बाहर बैठे सेंधमारों ने भारतीयों की 6.3 अरब खुफिया सूचनाओं तक पहुंच बना ली थी। हालत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर रक्षा व विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावासों, मिसाइल प्रणालियों, एनआइसी, यहां तक कि खुफिया एजेंसी- सीबीआइ के कंप्यूटरों पर भी साइबर हमले कर उनकी जासूसी हो चुकी है।

साइबर स्पेस के खतरों की बात अब काल्पनिक नहीं रह गई है। वर्चुअल आतंकवाद, सेंधमारी और सैन्य व आर्थिक महत्त्व की सूचनाओं के लीक होने जैसी घटनाओं ने साबित कर दिया है कि सूचनाओं के इलेक्ट्रॉनिक संजाल में घुसपैठ की रोकथाम के पुख्ता प्रबंध नहीं करने का खमियाजा दुनिया की कई सरकारों को भी उठाना पड़ सकता है। हाल में, पुलवामा हमले के फौरन बाद खबर मिली कि पाकिस्तानी हैकरों ने भारत सरकार से जुड़ी कम से कम नब्बे वेबसाइटों को हैक कर लिया। इनमें खासतौर से वित्तीय संचालन और पावर ग्रिड से संबंधित वेबसाइटें हैकरों के निशाने पर थीं।

साइबर कहें या वर्चुअल (आभासी) जंग, असल में अब इसका खतरा वास्तविक है। मामला सिर्फ भारत, पाकिस्तान या चीन तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें महाशक्तियां शामिल हैं। पिछले वर्ष अक्तूबर में कई पश्चिमी देशों ने रूस के सैन्य खुफिया विभाग पर दुनियाभर में कई साइबर हमले करने के आरोप लगाए थे। हालांकि रूस ने इन आरोपों को खारिज किया और कहा था कि कुछ पश्चिमी देश उसे योजनाबद्ध तरीके से फैलाए जा रहे दुष्प्रचार में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं।

इसमें संदेह नहीं रह गया है कि भविष्य की सबसे बड़ी चुनौती साइबर जंग होगी। साइबर युद्ध यानी इंटरनेट के जरिये संचालित की जाने वाली वे आपराधिक और आतंकी गतिविधियां जिनसे कोई व्यक्ति या संगठन देश-दुनिया और समाज को नुकसान पहुंचाने की कोशिश करे। अभी तक देश में इस तरीके से कई गैरकानूनी काम हुए, जैसे आॅनलाइन ठगी, बैंकिंग नेटवर्क में सेंध, लोगों- खासकर महिलाओं को उनके गलत प्रोफाइल बना कर परेशान करना आदि। साइबर जंग या आतंकवाद का हैकिंग के रूप में भी एक चेहरा ऐसा हो सकता है जिसमें खासतौर से महत्त्वपूर्ण सरकारी वेबसाइटों को निशाना बनाया जाए। भारत में हाल के साइबर हमलों की घटनाओं के बाद यह मांग तक उठने लगी है कि वर्चुअल जंग से दो-दो हाथ करने के मामले में हमारे देश में ठीक वैसा ही रवैया अपनाने की जरूरत है जैसा उड़ी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और पुलवामा हमले के बाद हवाई हमले के रूप में अपनाया गया है, यानी साइबर अपराधियों का संपूर्ण सफाया किया जाए। पर यह काम आसान नहीं है।

असल में साइबर युद्ध छेड़ने वाले अपराधियों का चेहरा साफ नहीं दिखता है। दुनिया के किसी भी कोने में बैठ कर सेंधमार सरकारी प्रतिष्ठानों की वेबसाइटों को चौपट करने के अलावा बैंकिंग से जुड़ी गतिविधियों में सेंधमारी करके अपना उल्लू सीधा कर सकते हैं। जहां तक सरकारी वेबसाइटों को निशाना बनाने की बात है तो ऐसा अक्सर दो देशों के बीच तनाव पैदा होने के हालात में ही सेंधमार करते हैं। ऐसी स्थिति में ये हैकर न सिर्फ सरकारी वेबसाइटों को अपने नियंत्रण में लेकर ठप कर डालते हैं, बल्कि सरकारी दूतावासों, प्रतिष्ठानों के कर्मचारियों-अधिकारियों के लॉगइन विवरण, ईमेल, पासवर्ड, फोन नंबर और पासपोर्ट नंबर चुरा लेते हैं और उन्हें दूसरी वेबसाइटों पर इस दावे के साथ लीक कर देते हैं कि फलां देश की साइबर सुरक्षा कितनी कमजोर है। खासतौर से भारत की सरकारी वेबसाइटों के बारे में हमारे देश के संदर्भ में हैकिंग की ये कार्रवाइयां बड़ी घटना मानी जाएंगी। इसकी दो अहम वजहें हैं। एक तो यह कि सूचना प्रौद्योगिकी के मामले में भारत खुद को अगुआ देश मानता रहा है, उसके आइटी विशेषज्ञ पूरी दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं और अमेरिका के कैलिफोर्निया में स्थापित सिलीकॉन वैली की स्थापना तक में युवा भारतीय आइटी विशेषज्ञों की भूमिका मानी जाती है।

साइबर खतरों को भांपते हुए सरकार छह साल पहले 2013 में राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति जारी कर चुकी है जिसमें देश के साइबर सुरक्षा के बुनियादी ढांचे की रक्षा के लिए प्रमुख रणनीतियों को अपनाने की बात कही गई थी। इन नीतियों के तहत देश में चौबीसों घंटे काम करने वाले एक नेशनल क्रिटिकल इन्फॉर्मेशन प्रोटेक्शन सेंटर (एनसीईआइपीसी) की स्थापना शामिल है, जो देश में महत्त्वपूर्ण सूचना तंत्र के बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए एक नोडल एजेंसी  के रूप में काम कर सके। सवाल है कि क्या इन उपायों को अमल में लाने में कोई देरी या चूक हुई है, अथवा यह हमारे सूचना प्रौद्योगिकी तंत्र की कमजोर कड़ियों का नतीजा है कि एक ओर सेंधमार जब चाहें, जो चाहें सरकारी प्रतिष्ठानों की वेबसाइटें ठप कर रहे हैं और दूसरी ओर साइबर आतंकी भी अपनी गतिविधियां चलाने में सफल हो रहे हैं?

भारत में इस तरह के साइबर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। एक आंकड़ा तो एडवर्ड स्नोडेन ने ही मुहैया कराया था। मार्च 2013 में स्नोडेन ने बताया था कि बाहर बैठे सेंधमारों ने भारतीयों की 6.3 अरब खुफिया सूचनाओं तक पहुंच बना ली थी। हालत यह है कि हमारे प्रधानमंत्री कार्यालय से लेकर रक्षा व विदेश मंत्रालय, भारतीय दूतावासों, मिसाइल प्रणालियों, एनआइसी, यहां तक कि खुफिया एजेंसी- सीबीआइ के कंप्यूटरों पर भी साइबर हमले कर उनकी जासूसी हो चुकी है। यह तथ्य भी प्रकाश में आया है कि विशुद्ध कारोबारी उद्देश्य से भी हमारी संचार सेवाओं को निशाना बनाया जा चुका है। जुलाई 2010 में इनसेट-4बी की बिजली प्रणाली में गड़बड़ी के कारण उसके एक सोलर पैनल ने काम बंद कर दिया था जिससे उसके आधे ट्रांसपॉन्डर ठप हो गए थे। पता चला कि यह काम व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के तहत किया गया था। किसी ने उसमें ‘स्टक्सनेट’ नामक वायरस पहुंचा दिया था, ताकि इनसेट से जुड़े टीवी चैनल चीनी उपग्रह पर चले जाएं! ऐसी ही एक घटना जुलाई, 2015 में हुई थी, जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की व्यावसायिक वेबसाइट ‘एंट्रिक्स’ हैक कर ली गई थी। इस करतूत के पीछे चीन का हाथ माना गया था। ये घटनाएं साबित करती हैं कि अगर कभी दुनिया में साइबर युद्ध के हालात पैदा हुए तो भारत को निशाना बनाना कितना आसान होगा।

बहरहाल, मामला चाहे चीनी-पाकिस्तानी हैकरों का हो या रूसी-कोरियाई हैकरों का, सवाल है कि आखिर वर्चुअल जंग रुकेगी कैसे? इसमें संदेह नहीं है कि दुनिया में अगला निर्णायक युद्ध साइबर युद्ध होगा क्योंकि सारी जानकारियां कंप्यूटर नेटवर्कों में ही समाई हुई हैं। आज सूचनाओं और जानकारियों का सारा संचालन इंटरनेट के जरिये ही हो रहा है। ऐसी स्थिति में विजेता वही होगा जो दुश्मन के कंप्यूटर नेटवर्क में सेंध लगाने में सक्षम होगा और हैकरों से इंटरनेट पर संचालित की जाने वाली सर्जिकल स्ट्राइक से निपट सकेगा।

जानकारों का मत यह है कि कुछ तकनीकों की वजह से देश से बाहर चल रही गतिविधियों पर निगरानी रखना संभव नहीं हो पाता है, जिसका फायदा विदेशी संगठन और अपराधी-आतंकी उठाने में कामयाब हो जाते हैं। असल मुद्दा विदेशों में स्थित प्रॉक्सी इंटरनेट सर्वर और वॉइस ओवर इंटरनेट प्रोटोकॉल (वीओआइपी) जैसी तकनीकों की निगरानी का अभाव है। वीओआइपी की पहचान करना और उसके सही पते-ठिकाने की जानकारी लेना काफी मुश्किल काम है। हालांकि राहत की बात यह है कि हमारे देश में वर्ष 2015 में इंटरनेट के जरिये होने वाली आपराधिक गतिविधियों के नियंत्रण के लिए एक विशेष कार्यबल बनाया जा चुका है। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर पर चौबीसों घंटे काम करने वाली कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम (सीईआरटी-इन), साइबर सुरक्षा के इमरजेंसी रिस्पांस और क्राइसिस मैनेजमेंट के सभी प्रयासों में तालमेल के लिए नोडल एजेंसी बनाने का प्रस्ताव भी किया गया था। राष्ट्रीय साइबर सुरक्षा नीति में यह प्रस्ताव भी था कि ट्विटर जैसी विदेशी वेबसाइटें किसी भी भारतीय उपभोक्ता से संबंधित सूचनाओं का आवागमन भारत स्थित सर्वरों से ही कर पाएं, अन्यथा नहीं। मुमकिन है कि ये इंतजाम वर्चुअल जंग के हालात पर नियंत्रण करने में हमारी कुछ सहायता कर पाएंगे।

Monday, 11 March 2019

चुनाव आयोग ने तत्काल प्रभाव से देश में आचार संहिता लागू की

Election Commission has implemented the code of conduct in the country with immediate effect (Author : R. Ranjan)


चुनाव आयोग ने हाल ही में लोकसभा चुनाव 2019 के लिए तारीखों की घोषणा कर दी है साथ ही चुनाव आयोग ने तत्काल प्रभाव से देशभर में आदर्श आचार संहिता भी लागू कर दी है। चुनाव आयोग के द्वारा की गई घोषणा के अनुसार देशभर में कुल 7 चरणों में लोकसभा चुनाव कराए जायेंगे। चुनाव के पहले चरण का मतदान 11 अप्रैल को होगा जबकि मतगणना 23 मई को होगी

आचार संहिता के दौरान किसी व्यक्ति, पार्टी या संगठन के लिए कुछ सामाजिक व्यवहार, नियम एवं उत्तरदायित्वों को निर्धारित किया जाता है और इन्हीं सब को आचरण संहिता अथवा आचार संहिता अथवा code of conduct  कहा जाता है. आइये जानते हैं आचार संहिता के बारे में अधिक जानकारी। 


क्या है आचार संहिता

➤ देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग के बनाए गए नियमों को ही आचार संहिता कहते हैं। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत निष्पक्ष और निर्विवाद चुनाव संपन्न कराना इसका मुख्य मकसद होता है 

 आचार संहिता लागू होते ही शासन और प्रशासन में कई अहम बदलाव हो जाते हैं

 राज्यों और केंद्र सरकार के कर्मचारी चुनावी प्रक्रिया पूरी होने तक चुनाव आयोग के कर्मचारी की तरह काम करते हैं

 आचार संहिता लागू होने के बाद सार्वजनिक धन का इस्तेमाल किसी ऐसे आयोजन में नहीं किया जा सकता जिससे किसी विशेष दल को फ़ायदा पहुंचता हों

 सरकारी गाड़ी, सरकारी विमान या सरकारी बंगला का इस्तेमाल चुनाव प्रचार के लिए नहीं किया जा सकता है

 आचार संहिता लगने के बाद सभी तरह की सरकारी घोषणाएं, लोकार्पण, शिलान्यास या भूमिपूजन के कार्यक्रम नहीं किए जा सकते हैं

 किसी भी पार्टी, प्रत्याशी या समर्थकों को रैली या जुलूस निकालने या चुनावी सभा करने की पूर्व अनुमति पुलिस से लेना अनिवार्य होता है

 राजनीतिक कार्यक्रमों पर नजर रखने के लिए चुनाव आयोग पर्यवेक्षक भी नियुक्त करता है

 कोई भी राजनीतिक दल जाति या धर्म के आधार पर मतदाताओं से वोट नहीं मांग सकता है

 ऐसा करने पर चुनाव आयोग दंडात्मक कार्रवाई भी कर सकता है


आचार संहिता के उल्लंघन पर चुनाव आयोग क्या कर सकता है?

 यदि कोई प्रत्याशी या राजनीतिक दल आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करता है तो चुनाव आयोग नियमानुसार कार्रवाई कर सकता है

 उम्मीदवार को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है जरूरी होने पर आपराधिक मुकदमा भी दर्ज कराया जा सकता है

 आचार संहिता के उल्लंघन में जेल जाने तक के प्रावधान भी है।


सामान्य आचार संहिता (general code)-

राजनीतिक पार्टियों को अपने प्रतिद्वंदी पार्टियों की उनके पिछले रिकॉर्ड के आधार पर ही आलोचना करनी होगी। वोटरों को लुभाने के लिए जाति और सांप्रदायिक लाभ उठाने से बचना होगा। झूठी जानकारी के आधार पर उम्मीदवारों की आलोचना नहीं करनी होगी। वोटरों को किसी तरह का रिश्वत नहीं देना होगा। प्रदर्शन और अनशन भी प्रतिबंधित होगा।


मीटिंग (meetings)- 

पार्टियों को अगर कोई बैठक या सभा करनी होगी तो उन्हें उस इलाके के स्थानीय पुलिस को इसकी पूरी जानकारी देनी होगी ताकि वे सुरक्षा व्यवस्था का पुख्ता इंतजाम कर सकें।


चुनाव प्रचार (processions)-

अगर दो या दो से अधिक पार्टियां एक ही रुट में चुनाव प्रचार के लिए निकली हैं तो आयोजनकर्ताओं को आपस में संपर्क कर ये तय करना होगा ताकि वे आपस में क्लैश ना हो जाएं। एक दूसरे के विरोध में हिंसा का प्रयोग बिल्कुल भी प्रतिबंधित होगा।


पोलिंग डे (polling day)- 

सभी पार्टी कार्यकर्ताओं को एक पहचान पत्र रखना होगा। इसमें किसी पार्टी का नाम नहीं होगा ना ही चुनाव चिन्ह और ना ही किसी चुनावी उम्मीदवार का नाम होगा।


पोलिंग बूथ (polling booths)-

केवल मतदाता जिनके पास चुनाव आयोग के द्वारा मान्य पास होगा वे ही पोलिंग बूथ के अंदर जा सकते हैं।


निरीक्षक (observers)-

चुनाव आयोग हर पोलिंग बूथ के बाहर एक निरीक्षक तैनात करेगा ताकि अगर आचार संहिता का कोई उल्लंघन कर रहा है तो उसकी शिकायत उनके पास की जा सके।


सत्ताधारी पार्टी (the party in power)- 

इस दौरान सत्ताधारी पार्टी के मंत्रियों को किसी भी तरह की आधिकारिक दौरे की मनाही होगी, ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि वे अपनी आधिकारिक दौरे पर चुनावी प्रचार ना करें। उन्हें किसी तरह के लोक लुभावने वादे नहीं करने होंगे। सार्वजनिक स्थानों पर किसी तरह का एकाधिकार नहीं होगा।


चुनावी घोषणापत्र (election manifestos)- 

2013 में जारी किए गए नए गाइडलाइन के मुताबिक इस नियम में ये कहा गया है कि चुनावी घोषणापत्र में बताए गए वादों को पूरा करना होगा। 


सामान्य नियम : 

 कोई भी दल ऐसा काम न करे, जिससे जातियों और धार्मिक या भाषाई समुदायों के बीच मतभेद बढ़े या घृणा फैले। 

 राजनीतिक दलों की आलोचना कार्यक्रम व नीतियों तक सीमित हो, न ही व्यक्तिगत। 

 धार्मिक स्थानों का उपयोग चुनाव प्रचार के मंच के रूप में नहीं किया जाना चाहिए। 

 मत पाने के लिए भ्रष्ट आचरण का उपयोग न करें। जैसे-रिश्वत देना, मतदाताओं को परेशान करना आदि। 

 किसी की अनुमति के बिना उसकी दीवार, अहाते या भूमि का उपयोग न करें। 

 किसी दल की सभा या जुलूस में बाधा न डालें। 

 राजनीतिक दल ऐसी कोई भी अपील जारी नहीं करेंगे, जिससे किसी की धार्मिक या जातीय भावनाएं आहत होती हों। 


राजनीतिक सभाओं से जुड़े नियम

  सभा के स्थान व समय की पूर्व सूचना पुलिस अधिकारियों को दी जाए। 

 दल या अभ्यर्थी पहले ही सुनिश्चित कर लें कि जो स्थान उन्होंने चुना है, वहॉं निषेधाज्ञा तो लागू नहीं है। 

 सभा स्थल में लाउडस्पीकर के उपयोग की अनुमति पहले प्राप्त करें। 

 सभा के आयोजक विघ्न डालने वालों से निपटने के लिए पुलिस की सहायता करें। 


जुलूस संबंधी नियम

 जुलूस का समय, शुरू होने का स्थान, मार्ग और समाप्ति का समय तय कर सूचना पुलिस को दें। 

 जुलूस का इंतजाम ऐसा हो, जिससे यातायात प्रभावित न हो। 

 राजनीतिक दलों का एक ही दिन, एक ही रास्ते से जुलूस निकालने का प्रस्ताव हो तो समय को लेकर पहले बात कर लें। 

 जुलूस सड़क के दायीं ओर से निकाला जाए। 

 जुलूस में ऐसी चीजों का प्रयोग न करें, जिनका दुरुपयोग उत्तेजना के क्षणों में हो सके। 


मतदान के दिन संबंधी नियम : 

 अधिकृत कार्यकर्ताओं को बिल्ले या पहचान पत्र दें। 

 मतदाताओं को दी जाने वाली पर्ची सादे कागज पर हो और उसमें प्रतीक चिह्न, अभ्यर्थी या दल का नाम न हो। 

 मतदान के दिन और इसके 24 घंटे पहले किसी को शराब वितरित न की जाए। 

 मतदान केन्द्र के पास लगाए जाने वाले कैम्पों में भीड़ न लगाएं। 

 कैम्प साधारण होने चाहिए। 

 मतदान के दिन वाहन चलाने पर उसका परमिट प्राप्त करें। 


सत्ताधारी दल के लिए नियम 

 कार्यकलापों में शिकायत का मौका न दें। 

 मंत्री शासकीय दौरों के दौरान चुनाव प्रचार के कार्य न करें। 

 इस काम में शासकीय मशीनरी तथा कर्मचारियों का इस्तेमाल न करें। 

 सरकारी विमान और गाड़ियों का प्रयोग दल के हितों को बढ़ावा देने के लिए न हो। 

 हेलीपेड पर एकाधिकार न जताएं। 

 विश्रामगृह, डाक-बंगले या सरकारी आवासों पर एकाधिकार नहीं हो। 

 इन स्थानों का प्रयोग प्रचार कार्यालय के लिए नहीं होगा। 

 सरकारी धन पर विज्ञापनों के जरिये उपलब्धियां नहीं गिनवाएंगे। 

 मंत्रियों के शासकीय भ्रमण पर उस स्थिति में गार्ड लगाई जाएगी जब वे सर्किट हाउस में ठहरे हों। 

 कैबिनेट की बैठक नहीं करेंगे। 

 स्थानांतरण तथा पदस्थापना के प्रकरण आयोग का पूर्व अनुमोदन जरूरी। 


ये काम नहीं करेंगे मुख्यमंत्री-मंत्री : 

 शासकीय दौरा (अपवाद को छोड़कर) 

 विवेकाधीन निधि से अनुदान या स्वीकृति 

 परियोजना या योजना की आधारशिला 

 सड़क निर्माण या पीने के पानी की सुविधा उपलब्ध कराने का आश्वासन 


अधिकारियों के लिए नियम

 शासकीय सेवक किसी भी अभ्यर्थी के निर्वाचन, मतदाता या गणना एजेंट नहीं बनेंगे। 

 मंत्री यदि दौरे के समय निजी आवास पर ठहरते हैं तो अधिकारी बुलाने पर भी वहॉं नहीं जाएंगे। 

 चुनाव कार्य से जाने वाले मंत्रियों के साथ नहीं जाएंगे। 

 जिनकी ड्यूटी लगाई गई है, उन्हें छोड़कर सभा या अन्य राजनीतिक आयोजन में शामिल नहीं होंगे। 

 राजनीतिक दलों को सभा के लिए स्थान देते समय भेदभाव नहीं करेंगे। 


लाउडस्पीकर के प्रयोग पर प्रतिबंध : चुनाव की घोषणा हो जाने से परिणामों की घोषणा तक सभाओं और वाहनों में लगने वाले लाउडस्पीकर के उपयोग के लिए दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं। इसके मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र में सुबह 6 से रात 11 बजे तक और शहरी क्षेत्र में सुबह 6 से रात 10 बजे तक इनके उपयोग की अनुमति होगी। 


आचार संहिता में मतदान के दिन संबंधी नियम

 राजनीतिक दलों द्वारा अधिकृत कार्यकर्ताओं को बिल्ले या पहचान पत्र दिए जाने चाहिए

 मतदाताओं को पोलिंग बूथ से पहले दी जाने वाली पर्ची सादे कागज पर होनी चाहिए तथा उस पर पार्टी का प्रतीक चिह्न, अभ्यर्थी या दल का नाम आदि लिखा नहीं होना चाहिए

 मतदान के दिन अथवा इससे 24 घंटे पूर्व राजनीतिक दलों द्वारा किसी को शराब वितरित नहीं की जानी चाहिए

 मतदान केन्द्रों के पास किसी प्रकार की सभा लाउडस्पीकर या भीड़ नहीं लगाए जाने चाहिए

इडुक्की के मरयूर गुड़ को जीआई टैग दिया गया


केरल के इडुक्की जिले में मिलने वाले मरयूर गुड़ को हाल ही में भौगोलिक संकेत (GI) टैग प्रदान किया गया है। मरयूर गुड़ का निर्माण सदियों से पारंपरिक विधि द्वारा किया जाता है जिसके चलते इसे जीआई टैग के लिए चयनित किया गया

राज्य के कृषि विभाग द्वारा दो वर्ष तक किये गये प्रयासों के बाद ही मरयूरी गुड़ को भौगोलिक संकेत हासिल हुआ है। जीआई टैग मिलने से क्षेत्रीय गन्ना किसानों को उनकी फसल के लिए अपेक्षित लाभ मिलने की आशा है


लाभ

वर्तमान में किसानों को मरयूर गुड़ के लिए प्रति किलो 45 से 47 रुपये का दाम मिलता है, परन्तु इसकी अपेक्षित कीमत 80-100 रुपये प्रति किलोग्राम है कई क्षेत्रों में मरयूर किस्म की नकली गुड़ भी बड़े पैमाने पर बेची जाती है, जिसके कारण वास्तविक मरयूर गुड़ की कीमत भी कम ही रह जाती है मरयूर गुड़ को जीआई टैग मिलने से उपभोक्ताओं को वास्तविक मरयूर गुड़ मिलेगा और किसानों को इसका अच्छा दाम भी मिलेगा


भौगोलिक संकेत (जीआई टैग)

➤ जीआई टैग अथवा भौगोलिक चिन्ह किसी भी उत्पाद के लिए एक चिन्ह होता है जो उसकी विशेष भौगोलिक उत्पत्ति, विशेष गुणवत्ता और पहचान के लिए दिया जाता है और यह सिर्फ उसकी उत्पत्ति के आधार पर होता है

➤ ऐसा नाम उस उत्पाद की गुणवत्ता और उसकी विशेषता को दर्शाता है

➤ दार्जिलिंग चाय, महाबलेश्वर स्ट्रोबैरी, जयपुर की ब्लूपोटेरी, बनारसी साड़ी और तिरूपति के लड्डू कुछ ऐसे उदाहरण है जिन्हें जीआई टैग मिला हुआ है

➤ जीआई उत्पाद दूरदराज के क्षेत्रों में किसानों, बुनकरों शिल्पों और कलाकारों की आय को बढ़ाकर ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचा सकते हैं

➤ ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले हमारे कलाकारों के पास बेहतरीन हुनर, विशेष कौशल और पारंपरिक पद्धतियों और विधियों का ज्ञान है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होता रहता है और इसे सहेज कर रखने तथा बढ़ावा देने की आवश्यकता है

Thursday, 7 March 2019

रक्षा मंत्रालय का फैसला महिलाओं को सेना के 10 ब्रांच में मिलेगा स्थायी कमीशन


रक्षा मंत्रालय की ओर से शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) से जुड़ा अहम फैसला आया, जिसमें भारतीय सेना की उन सभी दस ब्रांच में महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन दिए जाने की घोषणा की गई इससे पहले सेन्य बलों में महिलाओं की नियुक्ति शॉर्ट सर्विस कमीशन में होती थी। स्थायी कमीशन दिये जाने का मतलब है, अब महिलाएं रिटायरमेंट की उम्र तक सेना में काम कर सकती हैं। वे अपनी मर्जी के अनुसार या फिर रिटायरमेंट की उम्र खत्म होने पर नौकरी छोड़ सकती हैं


स्थायी कमीशन से क्या बदलेगा

शार्ट सर्विस कमीशन की तरफ से महिला अधिकारियों को सेवा के आखिरी चार साल पूरे करने से पहले उन्हें स्‍थाई कमीशन विकल्‍प दिया जाएगा। महिला अधिकारियों को जिन शाखाओं में पर्मानेंट कमीशन दिया जाएगा 

उनमें सिग्नल, इंजीनियर, आर्मी एविएशन, आर्मी एयर डिफेंस, इलेक्ट्रॉनिक्स और मैकेनिकल इंजीनियर, आर्मी सर्विस कॉर्प्स, आर्मी ऑर्डिनेंस कॉर्प्स और इंटेलिजेंस शामिल हैं


इन शाखाओं में थी स्थायी कमीशन की इजाजत

अब तक महिला अधिकारियों को सिर्फ दो शाखाओं (न्यायाधीश एडवोकेट जनरल (JAG) और सेना शिक्षा कोर) में स्थायी कमीशन की अनुमति थी। वर्तमान में भी सेनाओं में महिलाओं को जहां स्थाई कमीशन दिया जाता है वह कुछ ही गैर युद्धक ब्रांचों तक सीमित है


क्या है शॉर्ट सर्विस कमीशन

भारतीय जल सेना, थल सेना और वायु सेना में महिला अफसरों की भर्ती एसएससी यानी 'शार्ट सर्विस कमीशन' के जरिये भी की जाती है। एसएससी के जरिये भर्ती अफसर 14 साल तक सेवाएं दे पाते हैं। फिर ये महिलाएं 14 साल बाद रिटायर हो जाती हैं, जबकि कोई भी अधिकारी 20 साल की नौकरी करने के बाद पेंशन लेने का हक़दार बनाता है


साल 14 के बाद रोजगार में मुश्किल

14 साल की सेवा में महिलाएं लगभग 40 की उम्र, या उससे भी ज्यादा पार कर चुकी होती, जिसके बाद उन्हें रोजगार मिलना मुश्किल होता है। एसएससी के जरिए भर्ती हुई महिलाएं सिर्फ 14 साल तक सेना में काम कर पाने की वजह से पेंशन और दूसरे फायदे लेने योग्य नहीं होतीं। हमारी तीनों सेनाओं 'शार्ट सर्विस कमीशन' के जरिये भर्ती हुई करीब साढ़े तीन हजार महिला अधिकारी कार्यरत हैं


शार्ट सर्विस कमीशन का मकसद

शार्ट सर्विस कमीशन शुरू करने का मकसद सैन्य बलों में बीच के स्तर पर अफसरों की कमी दूर करना था

रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण शार्ट सर्विस कमीशन में महिलाओं को पुरुषों के समान स्थायी कमीशन मिलने की बात कह चुकी हैं


शार्ट सर्विस कमीशन में आए बदलाव
पहले सेना में शार्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के जरिए जो अधिकारी भर्ती होते थे, वह केवल 10 साल तक सेवा दे पाते थे। लेकिन सातवें वेतन आयोग के बाद इसे बढ़ाया गया है। अब वे 14 साल तक सेवा दे पाते हैं इसके साथ ही सातवें वेतन आयोग में यह विकल्प दिया गया है कि अगर कोई सात साल के बाद सेवा छोड़ना चाहता है, तो उसे गोल्डन हैंडसेक दिया जाएगा

महिला अधिकारियों के एक समूह ने स्थाई कमीशन का दायरा बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में रिट फाइल की थी। जिसके बाद सरकार ने दायरा बढ़ाने के फैसले पर विचार किया


कब हुआ था स्थाई कमीशन का ऐलान

पीएम मोदी ने 15 अगस्त को लाल किले से सेनाओं में शार्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) के जरिए भर्ती होने वाली महिला अफसरों को स्थाई कमीशन दिए जाने की घोषणा की थी


दुनिया भर में सेनाओं में महिलाओं को हासिल पद और कई ऐसे देश ऐसे हैं जहाँ लड़ाई को लीड करती हैं:- 

अमेरिका: अमेरिकी सेना में महिलाएं इराक और अफगानिस्तान में युद्धों के परिणामस्वरूप, 2002 से प्रत्यक्ष युद्ध महिलाओं में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। जनवरी 2013 में अमेरिकी सेना ने आधिकारिक तौर पर युद्ध की भूमिका में सेवा करने वाली महिला सैनिकों पर प्रतिबंध हटा लिया और कहा कि किसी को भी योग्यता प्राप्त करने के लिए अपने लिंग के बावजूद युद्ध की अगली पंक्तियों पर लड़ने का मौका मिलेगा

स्वीडन: 1989 से स्वीडिश सेना में किसी भी पद पर कोई लिंग प्रतिबंध नहीं रहा है। ब्रिटिश सर्वेक्षण के अनुसार, युद्ध सहित सभी सेवाओं और भूमिकाओं में महिलाओं को अनुमति है

स्पेन: मई 1999 में सशस्त्र बलों के कर्मियों के कानून ने लिंग भेदभाव को समाप्त कर दिया और महिलाओं को किसी भी सेवा में सभी पदों में शामिल होने की अनुमति दी गई

नीदरलैंड्स: डच महिलाओं को करीबी मुकाबला भूमिकाओं में अनुमति देता है

इजराइल: 1995 में इजरायली रक्षा बल ने महिलाओं को युद्ध की स्थिति में शामिल करना शुरू किया था

जर्मनी: यूरोपीय न्यायालय के न्यायमूर्ति के फैसले के बाद महिलाएं 2001 में जर्मन युद्ध इकाइयों में शामिल हो गईं, जिसमें कहा गया कि महिलाओं को युद्ध की भूमिका से रोकना लिंग समानता के सिद्धांतों के खिलाफ था

फ्रांस: महिलाएं पनडुब्बियोंऔर दंगा-नियंत्रण गेंडमेरी में छोड़कर फ्रांसीसी सेना में सेवा दे सकती हैं। 2006 के एक ब्रिटिश सर्वेक्षण में पाया गया कि युद्ध में 1.7% महिलाएं शामिल थीं और 19% फ्रांसीसी सैन्य कर्मी महिलाएं थीं

फिनलैंड: फिनलैंड महिलाओं को करीबी मुकाबला भूमिकाओं में अनुमति देता है। फिनिश रक्षा बलों और फिनिश सीमा गार्ड की सभी सेवाएं और इकाइयां महिलाओं को स्वीकार करती हैं

डेनमार्क: रक्षा मंत्रालय के 2010 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 1985 और 1987 में परीक्षणों के बाद युद्ध में महिलाओं की क्षमताओं की खोज के बाद 1988 में दानों को कुल समावेशन की नीति अपनाई। सर्वेक्षण में कई यूरोपीय देशों को सूचीबद्ध किया गया

कनाडा: 1989 से सभी सैन्य व्यवसाय महिलाओं के लिए खुले रहे हैं। पनडुब्बी सेवा 2000 में शुरु हुई थी कनाडा में सशस्त्र बलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व 2001 में 11.4% से बढ़कर फरवरी 2017 तक 15.1% हो गया है

ऑस्ट्रेलिया: 1 जनवरी, 2013 से, देश ने एडीएफ में सेवा करने वाली महिलाओं को ऑस्ट्रेलियाई रक्षा बल में सभी रोजगार श्रेणियों को खोला