Sunday, 7 January 2018

साइमन कमीशन


साइमन कमीशन की नियुक्ति ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने सर जॉन साइमन के नेतृत्व में की थी। इस कमीशन में सात सदस्य थे, जो सभी ब्रिटेन की संसद के मनोनीत सदस्य थे। यही कारण था कि इसे 'श्वेत कमीशन' कहा गया। साइमन कमीशन की घोषणा 8 नवम्बर, 1927 ई. को की गई। कमीशन को इस बात की जाँच करनी थी कि क्या भारत इस लायक हो गया है कि यहाँ लोगों को संवैधानिक अधिकार दिये जाएँ। इस कमीशन में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिस कारण इसका बहुत ही तीव्र विरोध हुआ।

स्थापना
1919 ई. के 'भारत सरकार अधिनियम' में यह व्यवस्था की गई थी, कि 10 वर्ष के उपरान्त एक ऐसा आयोग नियुक्त किया जायेगा, जो इस अधिनियम से हुई प्रगति की समीक्षा करेगा। भारतीय भी द्वैध शासन (प्रान्तों में) से ऊब चुके थे। वे इसमें परिवर्तन चाहते थे। अत: ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने समय से पूर्व ही सर जॉन साइमन के नेतृत्व में 7 सदस्यों वाले आयोग की स्थापना की, जिसमें सभी सदस्य ब्रिटेन की संसद के सदस्य थे।

विरोध
'साइमन कमीशन' के सभी सदस्य अंग्रेज होने के कारण कांग्रेसियों ने इसे 'श्वेत कमीशन' कहा। 8 नवम्बर, 1927 को इस आयोग की स्थापना की घोषणा हुई। इस आयोग का कार्य इस बात की सिफ़ारिश करना था कि, क्या भारत इस योग्य हो गया है कि, यहाँ के लोगों को और संवैधानिक अधिकार दिये जाएँ और यदि दिये जाएँ तो उसका स्वरूप क्या हो? इस आयोग में किसी भी भारतीय को शामिल नहीं किया गया, जिसके कारण भारत में इस आयोग का तीव्र विरोध हुआ। 'साइमन कमीशन' के विरोध के दूसरे कारण की व्याख्या करते हुए 1927 ई. के मद्रास कांग्रेस के अधिवेशन के अध्यक्ष श्री एम.एन. अंसारी ने कहा कि "भारतीय जनता का यह अधिकार है कि वह सभी सम्बद्ध गुटों का एक गोलमेज सम्मेलन या संसद का सम्मेलन बुला करके अपने संविधान का निर्णय कर सके। साइमन आयोग की नियुक्ति द्वारा निश्चय ही उस दावे को नकार दिया गया है।"

बहिष्कार का निर्णय
कांग्रेस के 1927 के मद्रास अधिवेशन में 'साइमन आयोग' के पूर्ण बहिष्कार का निर्णय लिया गया। इस कमीशन से भारतीयों का आत्म-सम्मान भी आहत हुआ, जिससे तेज बहादुर सप्रू बहुत प्रभावित हुए। 3 फरवरी, 1928 ई. को जब आयोग के सदस्य बम्बई (वर्तमान मुम्बई) पहुँचे तो इसके ख़िलाफ़ एक अभूतपूर्व हड़ताल का आयोजन किया गया। काले झण्डे एवं 'साइमन वापस जाओ' के नारे लगाये गए।

लाठी प्रहार
आयोग के विरोध के कारण लखनऊ में जवाहर लाल नेहरू, गोविन्द बल्लभ पंत आदि ने लाठियाँ खाईं। लाहौर में लाठी की गहरी चोट के कारण लाला लाजपत राय की 1928 ई. में मृत्यु हो गई। मरने से पहले लाला लाजपत राय का यह कथन ऐतिहासिक सिद्ध हुआ कि "मेरे ऊपर जो लाठियों के प्रहार किये गए हैं, वही एक दिन ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत (शवपेटी) की आख़िरी कील साबित होगा।" भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अतिरिक्त अन्य दलों ने भी 'साइमन कमीशन' का विरोध किया। मद्रास की जस्टिस पार्टी और पंजाब की यूनियनिस्ट पार्टी तथा मुस्लिम लीग के शफ़ी गुट को छोड़कर लगभग सभी प्रतिष्ठित राजनीतिक दलों ने कमीशन का बहिष्कार किया।

सिफारिशें
'साइमन कमीशन ने 27 मई', 1930 ई. को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की, जिसकी सिफ़ारिशें इस प्रकार हैं-
  • 1919 ई. के 'भारत सरकार अधिनियम' के तहत लागू की गई द्वैध शासन व्यवस्था को समाप्त कर उत्तरदायी शासन की स्थाना हो।
  • भारत के लिए संघीय संविधान होना चाहिए।
  • केन्द्र में भारतीयों के लिए संघीय संविधान होना चाहिए।
  • केन्द्र में कोई भी उत्तरदायित्व न प्रदान किया जाए।
  • उच्च न्यायालय को भारत सरकार के नियंत्रण में कर दिया जाए।
  • बर्मा (वर्तमान म्यांमार) को भारत से विलग किया जाए तथा उड़ीसा एवं सिंध को अलग प्रदेश का दर्जा दिया जाए।
  • प्रान्तीय विधानमण्डलों में सदस्यों की संख्या को बढ़ाया जाए।
  • गवर्नर व गवर्नर-जनरल अल्पसंख्यक जातियों के हितों के प्रति विशेष ध्यान रखें।
  • प्रत्येक 10 वर्ष बाद पुनरीक्षण के लिए एक संविधान आयोग की नियुक्ति की व्यवस्था को समाप्त कर दिया जाए तथा भारत के लिए एक ऐसा लचीला संविधान बनाया जाए जो स्वयं से विकसित हो।

आलोचना
'साइमन कमीशन की नियुक्ति से' भारतीयों दलों में व्याप्त आपसी फूट एवं मतभेद की स्थिति से उबरने एवं राष्ट्रीय आन्दोलन को उत्साहित करने में सहयोग मिला। यद्यपि इस आयोग की भारत में कड़ी आलोचना की गई, फिर भी उसकी अनेक बातों को 1935 ई. के 'भारत सरकार अधिनियम' में स्वीकार किया गया। सर शिवस्वामी अय्यर ने आयोग की सिफारिशों को 'रद्दी की टोकरी में फैंकने के लायक बताया।

Saturday, 6 January 2018

पाल कला


बौद्धों की प्राचीन कला शैली : बिहार और बंगाल में पाल शासको का दीर्घ काल तक शासन रहा था। उनके समय में नालन्दा, विक्रमशिला और उदंतपुरी कलात्मक गतिविधियों के केंद्र के रूप में खासे प्रसिद्ध थे। इस समय बौद्ध कला की छटा कुछ मद्धिम हो चली थी। फिर भी पाल शासकों ने स्थापत्य कला,चित्रकला और मूर्तिकला को नई उच्चाइयाँ प्रदान की। इसके उदाहरण आलोच्य पांडुलिपियों की चितरकारीयां और सरायटीले के भित्तिचित्र है। ऐसा देखने में मिला है कि इस समय अजन्ता शैली में चित्र बनाये गए थे जिसके सर्वोत्तम नमूने नेपाल के शाही दरबार,रॉयल एशियाटिक सोसायटी कलकत्ता, कला भवन काशी, महाराजा संग्रहालय बड़ौदा तथा बोस्टन संग्रहालय अमेरिका में सुरक्षित है।

मूर्तिकला :  -1.प्रस्तर मूर्ति  2. कांस्य मूर्ति कला

पालयुग में पत्थर और कांसे की मूर्तियों के निर्माण की एक उन्नत शैली का विकास बिहार प्रदेश में जिसका क्रमशः विकास बंगाल में दिखाई पड़ता है। कांस्य प्रतिमाओं के निर्माण में निर्णायक देन राजतक्षक धीमान और उनके पुत्र विठपाल की रही जिन्हें दो महान पाल शासकों धर्मपाल और देवपाल का संरक्षण प्राप्त था। नालन्दा और कुक्रिहार से प्राप्त कांस्य प्रतिमाए इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि कांस्य प्रतिमाये साँचे में ढाली जाती थी। नालन्दा के मंदिर स्थल संख्या 13 से प्राप्त अवशेष धातु के गलाने और उसे साँचे में ढ़ालने के प्रमाण प्रस्तुत करते है। नालन्दा से प्राप्त नमूने देवपाल के समय के है जबकि कुक्रिहार से प्राप्त मुर्तियाँ बाद की है। लेकिन इनकी खास विशेषता यह है कि दोनों मूर्तियों का निर्माण एक ही शैली में हुआ है। इसके अतिरिक्त फतेहपुर, अंतिचक और इमादपुर आदि से भी कुछ मुर्तियाँ, कांसे के बने हुए स्तूपों के मॉडल और कुछ बर्त्तन प्राप्त हुए है।मूर्तियाँ अधिक मात्रा में मिली है जिसमें अधिकांश का संबंध बौद्ध धर्म से है। बुद्ध, बोधिसत्व, अवलोकितेश्वर, मंजूश्री, मैत्रेय, तारा, जमला और हथग्रीव को इन मूर्तियों में दर्शाया गया है। हिन्दू देवी-देवताओं में मुख्यतः सूर्य,विष्णु,बलराम,गणेश और उमा-महेश्वर की मुर्तियाँ मिली है।

पालकालीन पत्थर की मुर्तियाँ भी कलात्मक सुंदरता का उत्तम उदाहरण प्रस्तुत करती है। ये मूर्तियाँ काले बेसाल्ट पत्थर की बनी है। इन पत्थरों को संथालपरगना और कैमूर की पहाड़ियों से प्राप्त किया गया है। सामान्यतः इन मूर्तियों में शरीर के अगले भाग को दिखाने चेष्टा जान पड़ती है। कुछ ही ऐसी मूर्तियाँ मिली है जिसमें उतनी ही कुशलता से उनके पृष्ठ भाग को भी उत्कीर्ण किया गया है। पत्थर की मूर्तियाँ भी अधिकत्तर बुद्ध एवं उनके विभिन्न रूपों की है; यथा मजूश्री, अवलोकितेश्वर तथा बोधिसत्व आदि। इसमें बुद्ध के जीवन को जीवंत करने की कोशिश की गयी है; जैसे उनका जन्म, ज्ञानप्राप्ति, प्रथम धर्मोपदेश की प्रस्तुति एवं निर्वाण आदि इसके बाद विष्णु की मूर्तियाँ है। जैन धर्म एवं शैवमत से संबंधित भी कई मूर्तियाँ मिली है।सभी मूर्तियां अत्यंत सुंदर है और कला की परिपक्वता को दर्शाती है। अलंकार की अधिकता इन्हें और भी आकर्षक बनाती है।

भित्ति चित्र

पालकाल में सुंदर एवं कलात्मक भित्तिचित्र भी देखे जा सकते है।इनके कुछ अवशेष अंतिचक स्थित विक्रमशिला महाविहार से मिले है। ऐसी मूर्तियाँ दीवारों पर सजावट के लिये बनाई जाती थी। इन भित्तिचित्रों धार्मिक आस्था और सामान्य जन- जीवन को प्रमुखता प्राप्त हुई है। बुद्ध, बोधिसत्व, तारा आदि की प्रस्तुति बौद्ध धर्म और विष्णु, आदिवराह, अर्द्ध नारीश्वर, सुर्य और हनुमान की प्रस्तुति हिन्दू धर्म के प्रभाव को स्पष्ट करती है। कलात्मक सुंदरता की सर्वोत्कृष्ट उदाहरण एक तख्ती है, जिसपर एक स्त्री को बैठी हुई मुद्रा में दिखाया गया है। दाहिना पैर बाए पैर पर रखा है और शरीर झुक हुआ है।एक हाथ में आईना लिए वह अपने रूप को निहार रही है और दूसरे हाथ की उँगलियों से अपनी माँग में सिंदूर भर रही है। चेहरे की सुंदरता और भोलापन ,भरी हुई छातियाँ,पतली कमर उसके शारीरिक सौंदर्य पर ध्यान केंद्रित करने का सफल प्रयास दिखती है। उसके शरीर को आभूषणों से ढँककर और आकर्षक बना दिया गया है।

चित्रकला का एक अन्य रूप भित्तिचित्र के रूप नालंदा जिले में स्थित सराय टीले के उत्खनन से मिले है। नालंदा महाविहार के मुख्य अवशेषों में प्रवेश के लिए बनाये गए मार्ग के निकट स्थित इस टीले का पूर्ण उत्खनन अभी नही हुआ है। फिर भी यह  स्पष्ट होता है कि यहाँ ईंटों से बना एक आयताकार स्तूप रहा होगा। इस स्तूप के प्रतिमा पीठ पर ढेर सारी चित्रकारियां मिलती है। नालन्दा के भित्तिचित्रों के निर्माण की प्रेरणा अजन्ता और बाघ की गुफाओं से ली गयी है। चित्रों को बनाने से पुर्व सर्वप्रथम पाषाण प्रतिमा की पीठ पर चुने की परत चढ़ाई गयी है; फिर रंगों का प्रयोग किया गया है।रंगों के लिए लाल ,पीले, सफेद, काले एवं निले रंगों का प्रयोग किया गया है।इन चित्रों में प्रयुक्त रंग बहुत हल्के किन्तु बहुत उच्च कोटि के है। स्तूप के उत्तरी,दक्षिणी एवं पीछे की दीवारों के अंदरूनी हिस्से में भी फूलों के झालर एवं गुलाब की चित्रकारी की गयी है। फूलों की झालर सफेद पृष्ठभूमि पर काले रंग से बनाया गया है। ये चित्रकारियाँ फलक के ऊपरी हिस्से में की गयी है। कुछ चित्रों की पहचान खड़े हाथी की आकृति,नृत्यरत रमणी,आसन्न जम्भल एवं एक हाथ में दर्पण लिए घुटनों के बल बैठी हुई नारी के रूप में की गयी है। इन चित्रों में सर्वाधिक स्पष्ट चित्र खड़े हाथी का है,जो उत्तर से दक्षिण की ओर देखता चित्रित किया गया है। इसके चित्रण में बड़ी दक्षता और तन्मयता दिखाई पड़ती है। जम्भल धन के देवता कुबेर का बौद्ध संस्करण है। यहाँ से प्राप्त चित्र में बैठे हुए लम्बोदर जम्भल को नकुलक धारण किये हुए चित्रित किया गया है। नकुलक उसके हाथों पर रत्न उगलते हुए बनाया गया है। चित्र में जम्भल के निकट एक नारी को हाथ में दर्पण लिए बैठी हुई अवस्था में दिखाया गया है। इसी फलक में दक्षिण से उत्तर की ओर देखता हुआ एक पुरुष आकृति भी है। एक दूसरी विशिष्ट कृति बुद्ध प्रतिमा के पाद पीठ पर अंकित की गयी है जिसमे सरपट दौड़ते हुए घोड़े को दिखाया गया है तथा तीन पक्तियां उत्कीर्ण की गयी है।

स्थापत्य कला 

स्थापत्य कला के क्षेत्र में पाल शासकों की निर्णायक भूमिका रही है।इसके साक्ष्य नालन्दा, विक्रमशीला और ओदंतपुरी के महाविहार है। नालन्दा में विभिन्न युगों में बने महाविहार स्तूप और मंदिर देखे जा सकते है। भिक्षुओं को रहने के लिए आवास एक निशिचत योजना के आधार पर बने हुये है जिसमें खुले आँगन के चारो ओर बरामदे है। इनके पीछे कमरे है जहां भिक्षु रहा करते थे। इमारतें दो मंजिला थी और इनमे सीढ़ियों की व्यवस्था थी।अंतिचक के स्थान से प्राप्त विक्रमशिला महाविहार के अवशेष पालकालीन स्थापत्य की विशिष्टता को और भी स्पष्ट करते है।यहां से एक। मंदिर और एक स्तूप के अवशेष मिले है। दोनों ही ईंट के बने हुए है। इनमें पत्थर और मिट्टी की बनी गौतम बुद्ध की विशाल मूर्तियां है। दीवारों केबाहरी हिस्से पर मिट्टी की तख्तियों से सजावट किया गया है। इनपर बौद्ध धर्म और वैष्णव धर्म दोनों का ही प्रभाव है। सामान्य जीवन के दृश्य भी उकेरे गए है।

चित्रकला 

पालकालीन चित्रकला के अध्ययन के लिये कुछ पांडुलिपियां उपलब्ध है जिनमे तालपत्रों पर चित्रकारियाँ की गयी है।इसके अतिरीक्त लघुचित्र और भित्तिचित्र के नमूने भी पाये गए है। महेन्द्रपाल और रामपाल के शासनकाल में बौद्धग्रंथ प्रज्ञापरमिता के जो संस्करण तैयार हुए थे उनमें भी ऐसी ही चित्रकारीयां की। गयी थी। इसके अतिरिक्त अष्टसहसत्रिका, प्रज्ञापरमिता तथा पंचरक्षा में इसीप्रकार की चित्र लिपियाँ मिलती है। इन चित्रलिपियों पर तांत्रिक प्रभाव अधिक दृष्टिगोचर होता है। साथ ही इसमें बुद्ध के जीवन से संबंधित घटनाओं,महायान सम्प्रदाय के देवी देवताओं तथा जातक कथाओं पर आधारित दृश्यों का चित्रण मिलता है। इन्हें बनाने के लिए उच्च कोटि के तालपत्र पर प्राथमिक रंगों का व्यवहार किया गया है।तत्पश्चात उन पर हरे भूरे, हल्के गुलाबी और बैगनी रंगों से चित्रकारी की गयी। नालन्दा से प्राप्त इन पांडुलिपियों के चित्रकारियों की विशिष्टता उनका उत्कृष्ट स्नायविक रेखांकन,इंदृयासक्त लालित्य एवं रैखिक अलंकृत शैली है। इन पर अजंता की  शास्त्रीय चित्रकला  एवं पूर्वी भारतीय इंद्रियासक्त भाव का प्रभाव है। इनकी नाक नुकीली तथा आँखें दोहरी वक्राकार है जिसमें स्नायविक तनाव दृष्टिगोचर होता है।

अन्य भारतीय कला केंद्रों की भाँति वनस्पतियों एवं जंतुओं के भाव नालन्दा की चित्रकला में भी दृष्टव्य है।कमलपुष्प के विविध रूपों से मंदिर का अधिकांश भाग अलंकृत किया गया है। अलंकरण का भाव लताओं,पत्रों तथा कुछ ज्यामितीय आकृतियों से इसप्रकार लिया गया है कि एक लयात्मक संतुलन बना रहे। भित्तिचित्रों की महिला पत्रों को चुस्त अंगिया पहने हुए दिखाया गया है। साथ ही दुपट्टा इसप्रकार रखा गया है कि स्तन पूर्णतः ढँक जाय। इन भित्तिचित्रों में अजंता की तरह विविध परिधान दिखाई नहीं पड़ते। प्रायः इन चित्रों में पुरुषों और नारियों दोनो को बाली,हार,चूड़ियाँ और बाजूबंद पहने दिखाया गया है।

मौर्य कला


कला की दृष्टि से हड़प्पा की सभ्यता और मौर्यकाल के बीच लगभग 1500 वर्ष का अंतराल है। इस बीच की कला के भौतिक अवशेष उपलब्ध नहीं है। महाकाव्यों और बौद्ध ग्रंथों में हाथीदाँत, मिट्टी और धातुओं के काम का उल्लेख है। किन्तु मौर्यकाल से पूर्व वास्तुकला और मूर्तिकला के मूर्त उदाहरण कम ही मिलते हैं। मौर्यकाल में ही पहले—पहल कलात्मक गतिविधियों का इतिहास निश्चित रूप से प्रारम्भ होता है। राज्य की समृद्धि और मौर्य शासकों की प्रेरणा से कलाकृतियों को प्रोत्साहन मिला।

इस युग में कला के दो रूप मिलते हैं।

1.राजरक्षकों के द्वारा निर्मित कला, जो कि मौर्य प्रासाद और अशोक स्तंभों में पाई जाती है। 
2. वह रूप जो परखम के यक्ष दीदारगंज की चामर ग्राहिणी और वेसनगर की यक्षिणी में देखने को मिलता है।

राज्य सभा से सम्बन्धित कला की प्रेरणा का स्रोत स्वयं सम्राट था। यक्ष—यक्षिणियों में हमें लोककला का रूप मिलता है। लोककला के रूपों की परम्परा पूर्व युगों से काष्ठ और मिट्टी में चली आई है। अब उसे पाषाण के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया।


राजकीय कला

राजकीय कला का सबसे पहला उदाहरण चंद्रगुप्त का प्रासाद है, जिसका विशद वर्णन "एरियन" ने किया है। उसके अनुसार "राजप्रासाद की शान—शौक़त का मुक़ाबला न तो सूसा और न एकबेतना ही कर सकते हैं।" यह प्रासाद सम्भवतः वर्तमान पटना के निकट कुम्रहार गाँव के समीप था। कुम्रहार की खुदाई में प्रासाद के सभा—भवन के जो अवशेष प्राप्त हुए हैं उससे प्रासाद की विशालता का अनुमान लगाया जा सकता है। यह सभा—भवन खम्भों वाला हाल था। सन् 1914—15 की खुदाई तथा 1951 की खुदाई में कुल मिलाकर 40 पाषाण स्तंभ मिले हैं, जो इस समय भन्न दशा में हैं। इस सभा—भवन का फ़र्श और छत लकड़ी के थे। भवन की लम्बाई 140 फुट और चौड़ाई 120 फुट है। भवन के स्तंभ बलुआ पत्थर के बने हुए हैं और उनमें चमकदार पालिश की गई थी। फ़ाह्यान ने अत्यन्त भाव—प्रवण शब्दों में इस प्रासाद की प्रशंसा की है। उसके अनुसार, "यह प्रासाद मानव कृति नहीं है वरन् देवों द्वारा निर्मित है। प्रासाद के स्तंभ पत्थरों से बने हुए हैं और उन पर सुन्दर उकेरन और उभरे चित्र बने हैं।" फ़ाह्यान के वृत्तान्त से पता चलता है कि अशोक के समय इस भवन का विस्तार हुआ।

मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र, सोन और गंगा के संगम पर बसा हुआ था। नगर की लम्बाई 9-1/2 मील और चौड़ाई 1-1/2 मील थी। नगर के चारों ओर लकड़ी की दीवार बनी हुई थी जिसके बीच—बीच में तीर चलाने के लिए छेद बने हुए थे। दीवार के चारों ओर एक ख़ाई थी जो 60 फुट गहरी और 600 फुट चौड़ी थी। नगर में आने—जाने के लिए 64 द्वार थे। दीवारों पर बहुत से बुर्ज़ थे जिनकी संख्या 570 थी। पटना में गत वर्षों में जो खुदाई हुई उससे काष्ठ निर्मित दीवार के अवशेष प्राप्त हुए हैं। 1920 में बुलंदीबाग़ की खुदाई में प्राचीर का एक अंश उपलब्ध हुआ है, जो लम्बाई में 150 फुट है। लकड़ी के खम्बों की दो पंक्तियाँ पाई गई हैं। जिनके बीच 14-1/2 फुट का अंतर है। यह अंतर लकड़ी के स्लीपरों से ढका गया है। खम्भों के ऊपर शहतीर जुड़े हुए हैं। खम्भों की ऊँचाई ज़मीन की सतह से 12-1/2 फुट है और ये ज़मीन के अन्दर 5 फुट गहरे गाड़े गए थे। यूनानी लेखकों ने लिखा है कि नदी—तट पर स्थित नगरों में प्रायः काष्ठशिल्प का उपयोग होता था। पाटलिपुत्र की भी यही स्थिति थी। सभा—मंडप में शिला—स्तंभों का प्रयोग एक नई प्रथा थी।

स्तंभ कला

मौर्यकाल के सर्वोत्कृष्ट नमूने, अशोक के एकाश्मक स्तंभ हैं जोकि उसने धम्म प्रचार के लिए देश के विभिन्न भागों में स्थापित किए थे। इनकी संख्या लगभग 20 है और ये चुनार (बनारस के निकट) के बलुआ पत्थर के बने हुए हैं। लाट की ऊँचाई 40 से 50 फुट है। चुनार की खानों से पत्थरों को काटकर निकालना, शिल्पकला में इन एकाश्मक खम्भों को काट—तराशकर वर्तमान रूप देना, इन स्तंभों को देश के विभिन्न भागों में पहुँचाना, शिल्पकला तथा इंजीनियरी कौशल का अनोखा उदाहरण है। इन स्तंभों के दो मुख्य भाग उल्लेखनीय हैं—(1) स्तंभ यष्टि या गावदुम लाट (tapering shaft) और शीर्ष भाग। शीर्ष भाग के मुख्य अंश हैं घंटा, जोकि अखमीनी स्तंभों के आधार के घंटों से मिलते—जुलते हैं। भारतीय विद्वान् इसे अवांगमुखी कमल कहते हैं। इसके ऊपर गोल अंड या चौकी है। कुछ चौकियों पर चार पशु और चार छोटे चक्र अंकित हैं (जैसे सारनाथ स्तंभ शीर्ष की चौकी पर) तथा कुछ पर हंसपक्ति अंकित है। चौकी पर सिंह, अश्व, हाथी तथा बैल आसीन हैं। रामपुर में नटुवा बैल ललित मुद्रा में खड़ा है। सारनाथ के शीर्ष स्तंभ पर चार सिंह पीठ सटाए बैठे हैं। ये चार सिंह एक चक्र धारण किए हुए हैं। यह चक्र बुद्ध द्वारा धर्म—चक्र—प्रवर्तन का प्रतीक है। अशोक के एकाश्मक स्तंभों का सर्वोत्कृष्ट नमूना सारनाथ के सिहंस्तंभ का शीर्षक है। मौर्य शिल्पियों के रूपविधान का इससे अच्छा दूसरा नमूना और कोई नहीं है। ऊपरी सिंहों में जैसी शक्ति का प्रदर्शन है, उनकी फूली नसों में जैसी स्वाभाविकता है और उनके नीचे उकेरी आकृतियों में जो प्राणवान वास्तविकता है, उसमें कहीं भी आरम्भिक कला की छाया नहीं है। शिल्पों ने सिंहों के रूप को प्राकृतिक सच्चाई से प्रकट किया है।

स्तंभों की—विशेषतः सारनाथ स्तंभ की—चमकीली पालिश, घंटाकृति तथा शीर्ष भाग में पशु आकृति के कारण पाश्चात्य विद्वानों ने यह मत व्यक्त किया है कि कला को प्रेरणा अखमीनी ईरान से मिली है। चौकी पर हंसों की उकेरी गई आकृतियों और अन्य सज्जाओं में यूनानी प्रभाव भी दिखाई देता है।

भारतीय विद्वानों के अनुसार अशोक के स्तंभ की कला का स्रोत भारतीय है। मौर्य स्तंभ—शीर्षों की पशु—मूर्तियाँ, सारनाथ का सिंहस्तंभ, रामपुरवा का बैल प्राचीन सिंधु घाटी से प्रवाहमान परम्परा के अनुकूल है। किन्तु वासुदेव शरण अग्रवाल ने महाभारत और आपस्तम्ब सूत्र से प्रमाण प्रस्तुत किए हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि चमकीली पालिश उत्पन्न करने की कला ईरान से कहीं पहले भारत में ज्ञात थी। मौर्यकाल से पूर्व और एक हद तक मौर्यकालीन स्थानों पर जो काली पालिश वाले मृदभांड पाए गए हैं उनसे प्रतीत होता है कि देश के इतिहास में एक युग ऐसा था जब ओपदार चमक में रुचि ली जाती थी। यह भी सिद्ध होता है कि पालिश का रहस्य केवल राजशिल्पियों तक सीमित नहीं था। पिंपरहवा स्तूप से मिली स्फटिक मंजूषा, पाटलिपुत्र के दो यक्ष और दीदारगंज की यक्षी में भी यह पालिश पाई जाती है। सारनाथ के धर्मचक्र की कल्पना नितांत भारतीय है।

ईरानी स्तंभों और मौर्य स्तंभों में स्पष्ट भेद हैं। स्वतंत्र स्तंभों की कल्पना भारतीय है। ईरानी स्तंभ नालीदार हैं जबकि भारतीय स्तंभ सपाट हैं। ईरानी स्तंभ अलग—अलग पाषाण—खंडों के बने हुए हैं किन्तु अशोक स्तंभ एक ही पत्थर के हैं। स्तंभ के शीर्ष भाग को घंटा कहा गया है। किन्तु भारतीय विद्वानों के अनुसार यह आवांगमुख कमल अथवा पूर्णघट है जो बाहर की ओर लहराती हुई कमल की पंखुड़ियों से ढका हुआ है। यदि कुछ समय के लिए इसे घंटा मान भी लिया जाए तो यह ईरानी घंटे से भिन्न है। तथाकथित मौर्य घंटा घटपल्लव या पूर्णघट के अभिप्राय के सदृश बनाया गया है। इसके अलावा ईरानी और मौर्य स्तंभ शीर्षकों के अलंकरणों में भी अंतर है। मौर्यकालीन शिल्पियों ने चिरपरिचित परम्परा को अपनाया और अपनी प्रतिभा से उसे नवीन आकार प्रदान किया।

यदि ईरानी प्रभाव को मान भी लिया जाए, तो भी अशोक स्तंभों की संगत राशी मूर्तिकला तथा अलंकरण को अखमीनी, ईरानी या यूनान की मूलाकृतियों की नक़ल मात्र नहीं माना जा सकता। विदेशी कला—लक्षणों का सम्यक् अध्ययन करके भारतीय कलाकारों ने अपनी प्रतिभा से रूपातंरण किया है और उन्हें अपने ढंग से कलाकृतियों में अभिव्यक्त किया है।

स्तूप कला

अशोक ने स्तूप निर्माण की परम्परा को भी प्रोत्साहन दिया। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार अशोक ने 8,400 स्तूप बनवाए। साँची तथा भरहुत के स्तूपों का निर्माण मूल रूप में अशोक ने ही करवाया था। शुंगों में साँची स्तूप का विस्तार हुआ।

अशोक ने वास्तुकला के इतिहास में एक नई शैली का प्रारम्भ किया, अर्थात चट्टानों को काटकर कंदराओं का निर्माण किया। गया के निकट बाराबर की पहाड़ियों में अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में सुदामा गुहा आजीवक भिक्षुओं को दान में दी। इस गुफा में दो कोष्ठ हैं। एक गोल व्यास है जिसकी छत—अर्धवृत्त या ख़रबूज़िया आकार की है। उसके बाहर का मुखमंडप आयताकार है किन्तु छत गोलाकार है। दोनों कोष्ठों की भित्तियों और छतों पर शीशे जैसी चमकती हुई पालिश है। इससे ज्ञात होता है कि चैत्य गृह का मौलिक विकास अशोक के समय में ही प्रारम्भ हो गया था और इस शैली का पूर्ण विकास महाराष्ट्र के भाजा, कन्हेरी और कार्ले चैत्यगृहों में परिलक्षित होता है। अशोक के पुत्र दशरथ ने नागार्जुनी पहाड़ियों में आजाविकों को 3 गुफाएँ प्रदान कीं। इनमें से एक प्रसिद्ध गुफा गोपी गुफा है। इनका विन्यास सुरंग जैसा है। इसके मध्य में ढोलाकार छत और दोनों शिरों पर दो गोल मंडप हैं, जिनमें से एक को गर्भगृह और दूसरे को मुखमंडप समझना चाहिए। इसमें अशोककालीन गृहशिल्प की पूर्णतः रक्षा हुई है।

लोक कला (Lok kala)

मौर्यकाल की लोक कला का ज्ञान उन महाकाय यक्ष—यक्षी मूर्तियों के द्वारा होता है जो मथुरा से पाटलिपुत्र, विदिशा, कलिंग और पश्चिम सूर्पारक तक पाई जाती है। इन यक्ष—यक्षियों की मूर्तियों की अपनी निजी शैली है, जिसका ठेठ रूप देखते ही अलग पहचाना जा सकता है। अतिमानवीय महाकाय मूर्तियाँ खुले आकाश के नीचे स्थापित की जाती थीं। इस सम्बन्ध में परखम ग्राम से प्राप्त यक्ष मूर्ति, पटना से प्राप्त यक्ष मूर्ति—जिस पर ओपदार चमक है और एक लेख भी है—पटना शहर में दीदारगंज से प्राप्त चामरग्राहिणी यक्षी—जिस पर भी मौर्य शैली की चमक है—और बेसनगर से प्राप्त यक्षी विशेष उल्लेखनीय है। ये मूर्तियाँ महाकाय हैं और माँसपेशियों की बलिष्ठता और दृढ़ता उनमें जीवंत रूप से व्यक्त हुई है। वे पृथक् रूप से खड़ी है पर उनके दर्शन का प्रभाव सम्मुखीन है, मानों शिल्पी ने उन्हें सम्मुख दर्शन के लिए ही बनाया हो। उनका वेश है सिर पर पगड़ी, कंधों और भुजाओं पर उत्तरीय, नीचे धोती जो कटि में मेखला से कायबंधन से बँधी है। कानों में भारी कुँडल, गले में कंठा, छाती पर तिकोना हार और बाहुओं पर अंगद है। मूर्तियों को थोड़ा घटोदर दिखाया गया है जैसे परखम की मूर्ति में देखने को मिलता है।

गुहा वास्तु (cave Art)

गुहा वास्तु भारतीय प्राचीन वास्तुकला का एक बहुत ही सुन्दर नमूना है। अशोक के शासनकाल से गुहाओं का उपयोग आवास के रूप में होने लगा था। गया के निकट बराबर पहाड़ी पर ऐसी अनेक गुफ़ाएँ विद्यमान हैं, जिन्हें सम्राट अशोक ने आवास योग्य बनवाकर आजीवकों को दे दिया था। अशोककालीन गुहायें सादे कमरों के रूप में होती थीं, लेकिन बाद में उन्हें आवास एवं उपासनागृह के रूप में स्तम्भों एवं मूर्तियों से अलंकृत किया जाने लगा। यह कार्य विशेष रूप से बौद्धों द्वारा किया गया।

पटना कलम (भारतीय चित्रकला)


भारतीय चित्रकला के विकास में ‘‘पटना कलम’’ का योगदान अविस्मरणीय है। सारे विश्व में भारतीय चित्रकला को जो ख्याति और प्रशंसा मिली है, उसका उल्लेख पटना कलम की चर्चा के बगैर अधूरा ही रहेगा। प्राचीन काल में मौर्य एवं गुप्त वंश के शासनकाल में भी पाटलिपुत्र की चित्रकला का विकास अवश्य हुआ, किन्तु सही मायने में यह कला यहीं उत्पन्न हुई। यहीं इसका पालन-पोषण हुआ।

कहा जाता है कि पटना शैली के चित्रकारों के पूर्वज प्रतापगढ़ (राजपुताना) के रहने वाले थे। बादशाह अकबर ने आगरा में एक चित्रशाला की स्थापना की। इस चित्रशाला में कला शिक्षकों की नियुक्ति के लिए उन्हीं चित्रकारों में से कुछ का चयन किया। इसी चित्रशाला के चित्रकार मनोहर पटना शैली की चित्रकला के पूर्वज माने जाते हैं।

मुगल शासन जब अंतिम साँसे गिन रहा था, तब चित्रकारों के कई दल दिल्ली छोड़कर इधर-उधर जीविका की खोज में निकल पड़े, क्योंकि दिल्ली में अब उनका आदर-सम्मान और उन्हें पुरूस्कृत करने वाले नहीं रह गए थे। उन चित्रकारों का एक दल मुर्शिदाबाद चला गया। इसी दल में वे चित्रकार थे, जिन्हें पटना शैली की चित्रकला का पूर्वज माना जाता है। मुर्शिदाबाद से हटाकर चित्रकारों का यह दल पटना चला आया और इन चित्रकारों में से अधिकतर लोदीकटरा, मोगलपुरा, नित्यानंद का कुआँ, मच्छरट्टा (पटना सिटी) आदि स्थानों में आ बसे। उस समय पटना आर्थिक दृष्टि से सुखी-सम्पन्न था। लोगों में ललित कला और विधा के प्रति प्रेम था। दिल्ली की तरह यहाँ भी राजे-रजवाड़े ललित कला के प्रेमी और जानकार थे। दानापुर फौजी छावनी के फौजी अफसर भी चित्रों के प्रेमी थे। अतः चित्रकारों को प्रश्रय और जीविका का साधन मिल गया। आरम्भ में ये चित्रकार अपने मालिकों की इच्छा के अनुसार चित्र बनाते और उनके घरों को चित्रों से सजाया करते थे।

मुर्शिदाबाद से आने वाले चित्रकारों में सेवक राम का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके चित्र पटना संग्रहालय में देखे जा सकते हैं। सेवक राम के जैसे हुलास लाल, झुमक लाल, फकीरचंद लाल, टुन्नी लाल जैसे अनेक चित्रकारों ने पटना शैली की चित्रकला को विकसित और समृद्ध किया।

सन् १८५० से १८८० ई. की अवधि में पटना शैली के दो प्रमुख चित्रकार शिवदयाल जी और शिवलालजी सामने आए। इन दोनों की अपनी-अपनी विशेषताएं थीं। शिवदयाल लघु चित्र बनाने में सिद्धहस्त थे। इन दोनों ने अपनी-अपनी चित्रशालाएं खोलीं। इन चित्रशालाओं ने पटना कलम को गोपाल लाल, गुरू सहायलाल, बनी लाल, कन्हाई लाल, जयगोविन्द लाल, बहादुर लाल और जमुना प्रसाद जैसे उच्चकोटि के चित्रकार दिए। उस समय श्रीमती दक्षो बीबी और श्रीमती सोना कुमारी भी अच्छी चित्रकारी करती थीं।

धीरे-धीरे चित्रशालाएं बंद हो गई। चित्रकारों की मंडली बिखर गई। बहुत से चित्रकार पटना छोड़कर कहीं और चले गए। कुछ जीविका के लिए कुछ और काम में लग गए, फिर भी एक पुराना घराना लोदीकटरा में रह गया। यह मुंशी महादेव लाल का घराना था। महादेव लाल हाथी दाँत, कागज और अबरख पर भी चित्रकारी करते थे। वे राय दुर्गा प्रसाद के दरबार में रहते थे। १९४३ ई. में पटना सिटी में ही उनका देहान्त हो गया।

भारत प्रसिद्ध चित्रकार ईश्वरी प्रसाद वर्मा पटना शैली के अंतिम चित्रकार थे। उन्होंने पटना सिटी में अपनें नाना प्रसिद्ध चित्रकार श्री शिवलाल जी के यहाँ रहकर शिक्षा ग्रहण की। उसके बाद कलकत्ता आर्ट स्कूल में प्रोफेसर नियुक्त हुए और वहीं से वाइस प्रिंसिपल के पद से सेवा निवृत्त हुए। कागज और हाथी दाँत पर हर प्रकार का काम करने में वे दक्ष थे। कलकत्ता के संग्रहालय में उनके चित्र सुरक्षित हैं। १९४९ ई. में पटना में ही उनका स्वर्गवास हो गया।

पटना कलम के चित्रकार अत्यन्त प्रतिभाशाली और कुशल कलाकार थे। इनमें कुछ ऐसे गुण थे जो अन्य कलाकारों में दुर्लभ हैं। यह कागज और रंग खुद ही तैयार करते थे। कुछ चित्रों के लिए ये नेपाली कागज का प्रयोग करते थे और खास-खास चित्रों के लिए एक विशेष प्रकार के कागज का प्रयोग करते थे, जिसे वसली कहा जाता था। चित्रों पर चमक और चिकनापन लाने के लिए वे दो फीट चौड़े और ढ़ाई फीट लम्बे एक पत्थर का प्रयोग करते थे। इस पत्थर को अच्छी तरह बराबर करने के बाद उस पर रांजन, गोंद के बुरादे देकर कंबल के टुकड़ों से अच्छी तरह घिसते थे। इस प्रक्रिया से वह आईने की तरह चमकने लगता था। पत्थर पर चित्र का पहला रंग चढ़ाकर उसे पलट देते थे और उसे शंख से घिसते रहते थे। इस प्रक्रिया से रंग बैठ जाता था तथा चित्र में चिकनापन और चमक आ जाती थी।

पटना शैली के चित्रकार कागज के अलावा रंग भी जैसे- वृक्ष की छाल, फूल, पत्थर, धातु आदि तरह-तरह की वस्तुओं से खुद ही तैयार कर लेते थे। कुसुम और हरसिंगार के फूल से लाल, वृक्ष की छाल से पीला, लाजू पत्थर से नीला, लाह से गुलाबी, सीप जलाकर तथा कश्मीरी मिट्टी और शीशा से सफेद, गेरू मिट्टी और शिग्रीक से खास किस्म का लाल तथा चिराग के फुलिए से काला रंग तैयार किया जाता था। 

कागज और रंगों के अलावा पटना शैली के चित्रकार तूलिका भी स्वयं ही तैयार कर लेते थे। बारीक चित्रकारी के लिए गिलहरी की पूँछ के बाल से तूलिका तैयार की जाती थी।

पटना कलम के चित्रकारों की चित्रांकन प्रणाली के सम्बन्ध में इस शैली के सुप्रसिद्ध चित्रकार राधामोहन बाबू ने लिखा है-- पटना शैली के चित्रों ने अपने आदर्श व्यवस्था तथा रचना-प्रणाली में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। चित्रांन प्रणाली के विषय में कहा जा सकता है कि शेडिंग में तिरछे बिन्दुओं का प्रयोग किया गया है। आधार-भूमि के अंकन में अधिकतर सुन्दर दृश्यों से काम लिया गया है जैसे- नदी के सामने गृह-द्वार, उपवन, स्तम्भों से युक्त भवन का अंश आदि। चित्रों में मौलिक और चटकीले रंगों का भरपूर उपयोग किया गया है।

पटना कलम के चित्रों के विषय में राधामोहन बाबू कहते हैं कि पटना शैली के चित्रकार राज दरबार से सम्बद्ध घटनाओं और दृश्यों के साथ-साथ दैनिक जीवन की साधारण घटनाओं पर भी अपनी तूलिका चलाते थे, जैसे- संगताराश, चर्मकार, पालकी ढोने वाले, शराब की भट्ठी, पाठशाला आदि के दृश्य भी अंकित करते थे। इनके अलावा पशु-पक्षियों के भी सजीव चित्र बनाते थे। पशुओं में केवल हाथी-घोड़े, निम्न श्रेणी के पशुओं और सवारियों को भी चित्रित किया, जैसे-- गाय, भैंस, इक्का, बैलगाड़ी आदि।

पटना शैली के चित्रकार जनजीवन से जुड़े थे, इसलिए उन्होंने अपनी कलाकृतियों में किसानों-मजदूरों के जीवन को चित्रित किया। उनके चित्रों में मछली बेचनेवालियों, टोकरी बनानेवाले, लुहार, दर्जी, कुम्हार, चर्खा आदि जन-साधारण के जीवन को अंकित किया है।

‘‘पटना कलम’’ की प्राचीन कृति है-- सेवक राम द्वारा निर्मित चित्र-- पटनिया इक्का। शिवलाल का ‘‘एक मुसलमानी विवाह’’ पटना शैली का एक उत्कृष्ट गोपाल लाल का चित्र ‘‘होली’’, महादेव लाल का ‘‘रागिनी गांधारी’’, हुलास लाल का ‘‘जुआड़ियों का अड्डा’’ और ‘‘महिलाओं की मधुशाला’’ तथा ईश्वरी प्रसाद वर्मा के चित्र ‘‘पर्दानशी’’, ‘‘संसार में शिशु’’ और ‘‘भारतमाता’’ पटना शैली के उत्कृष्ट नमूने हैं।

पटना शैली के चित्रों को व्यापक सराहना और ख्याति मिली है। तत्कालीन पटना के बैरिस्टर मानुक साहब, कलक्टर आर्चर, प्रसिद्ध चित्रकार अवनींद्रनाथ ठाकुर, अंग्रेज व्यापारी लयाल आदि कई विदेशी लेखकों, कलाविदों और विद्वानों ने भी पटना शैली के चित्रों की सराहना की है। तत्कालीन अधिकारी आचर्र की पत्नी ने तो पटना-पेटिंग पर एक स्वतंत्र पुस्तक ही लिखी है।

पटना शैली के चित्रों में समकालीन जन-जीवन का बड़ा ही सजीव और प्रभावशाली चित्रण हुआ है। निस्संदेह भारतीय चित्रकला को पटना कलम की देन अत्यन्त महत्वपूर्ण और अविस्मरणीय है। पटना शैली ने भारतीय चित्रकला के विकास और समृद्धि में अभूतपूर्व योगदान दिया है।

Thursday, 4 January 2018

चिनाब नदी पर विश्व का सबसे ऊंचा पुल


भारत सरकार द्वारा जम्मू और कश्मीर को एक वैकल्पिक एवं विश्वसनीय परिवहन प्रणाली प्रदान के उद्देश्य से 345 किमी. लंबी. रेलवे लाइन निर्माण की योजना बनाई गई है। जम्मू-उधमपुर-कटरा-काजीगुंड-बारामूला रेलवे लाइन स्वतंत्रता के बाद से पर्वतीय रेलवे के निर्माण में सबसे बड़ी (345 किमी.) परियोजना है। इस परियोजना के जम्मू-उधमपुर खंड (53 किमी.), अनंतनाग राजवंशर खंड (66 किमी.), राजवंशर-बारामूला खंड (35 किमी.) और काजीगुंडा से अनंतनाग खंड (18 किमी.) का परिचालन प्रारंभ हो चुका है। हाल ही में इस परियोजना के चिनाब रेल पुल के प्रमुख मेहराब की शुरुआत की गई।

  • नवंबर, 2017 में भारतीय रेलवे ने जम्मू और कश्मीर के रियासी जिले में चिनाब नदी पर विश्व के सबसे ऊंचे पुल के मुख्य मेहराब (Main Arch) की शुरुआत की।
  • मुख्य मेहराब का विस्तार 465 मीटर है।
  • यह पुल चिनाब नदी के तल से 359 मीटर ऊँचा होगा।
  • यह पुल कटरा एवं बनिहाल के मध्य 111 किमी. विस्तार के महत्वपूर्ण लिंक का निर्माण करता है, जो कि कश्मीर रेल परियोजना के उधमपुर-श्रीनगर-बारामूला खंड का हिस्सा है।
  • 1.315 किमी. लंबे इस पुल का निर्माण 1250 करोड़ रुपये की लागत से किया जा रहा है।
  • पुल का निर्माण कार्य एफकॉन्स (Afcons) अवंसरचना लि. द्वारा कोंकण रेलवे के माध्यम से किया जा रहा है।
  • मई, 2019 तक पुल का निर्माण कार्य पूरा होगा।
  • यह पुल 260 किमी. प्रति घंटे की गति वाली वायु का सामना कर सकता है।
  • पुल का जीवन काल 120 वर्ष होगा।
  • पुल का निर्माण कार्य वर्ष 2004 में प्रारंभ हुआ था।
  • यह पुल 8 रिक्टर स्केल के भूकंप को सहन करने में सक्षम है।
  • पूर्ण होने के पश्चात चिनाब रेल पुल विश्व का सबसे ऊंचा रेल पुल होगा।
  • यह पुल बक्कल (कटरा) और कौरी (श्रीनगर) को जोड़ेगा।
  • चिनाब नदी की दूसरी तरफ भारतीय रेलवे द्वारा विभिन्न लंबाई की तीन सुरंगों टी-2 (5.9 किमी.), टी-3 (9.369 किमी.) और टी-14 (13 किमी.) का निर्माण किया जा रहा है।
  • वर्तमान में चीन में बेईपस नदी पर निर्मित शुइबाई (Shuibai) रेलवे पुल विश्व का सबसे ऊंचा रेल पुल है।

Wednesday, 3 January 2018

Astha Circuit Trains



Indian Railways is operating Astha Circuit Trains and State Special Trains for promotion of religious tourism across India. Astha Circuit Trains were announced in Rail Budget, 2016. Indian Railway Catering and Tourism Corporation Limited (IRCTC) inaugurated the trip of Astha Circuit Trains on 17.02.2017 for Guwahati covering Kolkata, Bhubaneshwar and Puri. So far 10 Astha Circuit Trains are operated. IRCTC with collaboration of State Governments is operating State Special Trains for senior citizens (60 years and above) of the respective States. So far, State Special Trains were operated for the State of Madhya Pradesh, Rajasthan, Chhattisgarh, Punjab, Odisha, Jharkhand and Uttar Pradesh covering important pilgrim/religious destinations of India. Currently, State Special Trains are being operated for Madhya Pradesh, Odisha, Chhattisgarh, Jharkhand and Rajasthan.

Astha Circuit Trains and State Special Trains are operated by IRCTC. The cost of trip for Astha Circuit Trains is paid by passenger itself at D900/- + GST per passenger per day, whereas, the cost of trip for State Special Trains is borne by the respective State Government and the beneficiaries are selected by the respective State Governments. IRCTC provides all inclusive services to passengers during the tour of Astha Circuit Trains and State Special Trains. It includes rail and road transportation, accommodation (dharamshala/dormitory), sightseeing, meals, accidental insurance etc. In addition, as per the instruction of State Government, passengers of State Special Trains are also provided additional requirements like traveler’s kit which includes cap, toothbrush & paste, hair oil, comb, shampoo etc. The entire cost of value added services is borne by concerned State Governments.

Accident Insurance to Train Passengers


An Optional Travel Insurance Scheme has been launched w.e.f 01.09.2016 for the Confirmed/RAC railway passengers who book e-ticket through official website of Indian Railway Catering & Tourism Corporation (IRCTC) portal at the premium of ` 0.92 per passenger. Under the scheme, sum assured is paid to the victim/family or legal heir of the victim as the case may be in case of death/injury of reserved passengers due to train accident/untoward incidents as defined under section 123 read with Sections 124 and 124A of the Railways Act, 1989, subject to the qualification that the coverage will be valid from the actual departure of train from the originating station to actual arrival of train at the destination station including ‘process of entraining’ and ‘process of detraining’ the train.

Subsequently, to promote digital/cashless transaction, insurance is being provided free of cost from 10.12.2016 to all the Confirmed/RAC Railway passengers buying online ticket from IRCTC and no premium is being charged from the passengers.

The Sum assured to be given to victim/family or legal heir of the victim are as follows:-

(i) In case of Death- ` 10 lakh,

(ii) Permanent Total Disability - ` 10 Lakh,

(iii) Permanent Partial Disability upto- ` 7.5 Lakh,

(iv) Hospitalization Expenses for Injury – ` 2 Lakh,

(v) Transportation of mortal remains – ` 10 Thousand.


An amount of ` 2,47,14,275/- (Two Crore Forty Seven Lakh Fourteen Thousand Two Hundred and Seventy Five ) has been paid as compensation by the Insurance Companies since inception (i.e. from 01.09.2016) to 30.11.2017.

वर्षांत समीक्षा 2017: संसदीय कार्य मंत्रालय


बजट सत्र 2017:

➽ भारतीय विधायिका के इतिहास में पहली बार केंद्रीय बजट अग्रिम रूप से 01 फरवरी को प्रस्‍तुत किया गया। यह एक बहुत बड़ा वित्‍तीय सुधार है ताकि मंत्रालयों को अपनी विकासात्‍मक परियोजनाओं के कार्यान्‍वयन हेतु पूरी निधियां उपलब्‍ध कराई जा सके। बजट अग्रिम रूप से प्रस्‍तुत किये जाने के बाद लेखानुदान की भी जरूरत नहीं पड़ी।
➽ 2017 में सामान्‍य बजट तथा रेलवे बजट भी पहली बार मिला दिया गया तथा एकीकृत केंद्रीय बजट प्रस्‍तुत किया गया। बजट सत्र के दौरान लोकसभा की उत्‍पादकता 113.27 प्रतिशत तथा राज्‍यसभा की 92.43 प्रतिशत रही। बजट सत्र 2017 के दौरान संसद के दोनों सदनों द्वारा 18 बिल पारित किए गए।
➽ सामान और सेवा कर (जीएसटी): बजट सत्र 2017 के दौरान जीएसटी को समर्थ बनाने वाले सभी अधिनियम पारित करवा लिए गए। केंद्रीय सामान एवं सेवा कर बिल 2017, एकीकृत सामान और सेवा कर बिल 2017, सामान और सेवा कर (राज्‍य क्षतिपूर्ति) बिल 2017 तथा संघ शासित प्रदेश सामान और सेवा कर बिल 2017 नामक 4 ऐतिहासिक बिल संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित किए गए, जिसके कारण सामान और सेवा कर 01 जुलाई, 2017 से पूरे देश में लागू किया जा सका।

मानसून सत्र 2017
➽ लोकसभा में 17 बिल पेश किए गए।
➽ दोनों सदनों द्वारा 13 बिल पास किए गए।
➽ मानसून सत्र के दौरान ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 75वीं वर्षगांठ मनाने के लिए 09.08.2017 को दोनों सदनों में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ की 75वीं वर्षगांठ पर एक विशेष चर्चा आयोजित की गई तथा सभी पार्टियों के बीच व्‍यापक सहमति से ‘2022 तक नया भारत’ बनाने हेतु ‘संकल्‍प से सिद्धि’ का संकल्‍प पहली बार लिया गया।
➽ सामान और सेवा कर (जीएसटी) का जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य तक विस्‍तार मानसून सत्र 2017 के दौरान एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी क्‍योंकि संबद्ध बिलों के पारित होने से राज्‍य की शेष देश के साथ आर्थिक एकता का मार्ग प्रशस्‍त होगा।
➽ लोकसभा की उत्‍पादकता 77.94 प्रतिशत जबकि राज्‍यसभा की 79.95 प्रतिशत थी।

शीतकालीन सत्र 2017 (26.12.2017 तक) 
➽ लोकसभा में 9 बिल प्रस्‍तुत किए गए।
➽ संसद के दोनों सदनों द्वारा 2 बिल पारित किए गए।
विदेशों में अपने समकक्षों तथा अभिमतदाताओं के साथ राष्‍ट्रीय नीतियों तथा विभिन्‍न उपलब्धियों पर चर्चा करने तथा भारत के पक्ष में उनकी सद्भावना तथा पक्ष सुनिश्चित करने के दृष्टिकोण से 29 मई से 6 जून, 2017 तक तत्‍कालीन संसदीय कार्य राज्‍यमंत्री श्री सुरेन्‍द्रजीत सिंह अहलुवालिया के नेतृत्‍व में विभिन्‍न राजनैतिक पार्टियों (लोकसभा/राज्‍यसभा) के 10 नेताओं/सांसदों के भारतीय संसदीय सद्भावना शिष्‍टमंडल ने स्‍वीडन, नार्वे तथा इजरायल का भ्रमण किया।

तत्‍कालीन संसदीय कार्य राज्‍यमंत्री श्री एस.एस अहलुवालिया ने केंद्रीय विद्यालयों के लिए 29वीं राष्‍ट्रीय युवा संसद प्रतियोगि‍ता 2016-17 तथा दिल्‍ली के विद्यालयों के लिए 51वीं युवा संसद प्रतियोगिता 2016-17 के लिए पुरस्‍कार वितरित किए। 25 केंद्रीय विद्यालयों तथा 33 दिल्‍ली के विद्यालयों के विद्यार्थियों, प्रधानाचार्यों तथा प्रभारी अध्‍यापकों ने मंत्री से ट्रॉफियां एवं पुरस्‍कार प्राप्‍त किए। युवा संसद योजना का उद्देश्‍य युवा पीढ़ी को स्‍व-अनुशासन की भावना, विविधमत के प्रति सहनशीलता, विचारों की सही अभिव्‍यक्ति तथा जीवन के प्रजातांत्रिक ढंग के अन्‍य गुण समझाना है। इसके अलावा इस योजना में विद्यार्थियों को संसद की प्र‍क्रिया एवं कार्यविधि, चर्चा तथा बहस करने की तकनीकों से अवगत कराना और उनमें स्‍वाभिमान, नेतृत्‍व का गुण तथा प्रजातंत्र के हालमार्क प्रभावी वक्‍तृता की कला और कौशल विकसित करना है।

भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ: मंत्रालय ने भारत छोड़ो आंदोलन की 75वीं वर्षगांठ मनाने तथा भारत की स्‍वतंत्रता की 75वीं वर्षगांठ ‘2022 तक नया भारत’ बनाने के संकल्‍प के रूप में फिर से भावना जगाने के लिए अगस्‍त-अक्‍टूबर 2017के महीनों के दौरान पूरे देश में 39 विभिन्‍न स्‍थानों पर एक प्रदर्शनी एवं सांस्‍कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की योजना समन्‍वित की।

‘नया भारत करके रहेंगे’ शीर्षक प्रदर्शनी आयोजित की गयी। इसके अलावा न्‍यू डिजिटल भारत की अवधारणा के अनुरूप 65 प्रतिशत सामग्री डिजिटल, विडियो तथा संवादात्‍मक प्ररूप में रखी गयी।

प्रदर्शनियां 1857 से 1947 तक के भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन पर केंद्रित थीं जिनमें अंगेजी शासन से स्‍वतंत्रता हासिल करने के लिए शुरू की गयी विभिन्‍न गतिविधियेां-‘स्‍वतंत्रता का प्रथम संग्राम-1857’, ‘चम्‍पारण सत्‍याग्रह’, ‘असहयोग आंदोलन’, ‘डांडी यात्रा’ तथा ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का प्रदर्शन किया गया।

यह कार्यक्रम भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी के छ: सूत्री संकल्‍प यथा भ्रष्‍टाचार मुक्‍त, गरीबी मुक्‍त, गंदगी मुक्‍त, साम्प्रदायिकता मुक्‍त, आतंकवाद मुक्‍त तथा जातिवाद मुक्‍त देश के लिए शुरू किए गए जन अभियान के अनुरूप था।       

वर्षांत समीक्षा: पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय


स्‍वच्‍छ भारत मिशन

हर जगह स्‍वच्‍छता सुनिश्चित करने के प्रयासों में तेजी लाने और सुरक्षित साफ-सफाई उपलब्‍ध कराने पर ध्‍यान केन्द्रित करने के लिए प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने महात्‍मा गांधी की जयंती पर 2 अक्‍टूबर, 2014 को स्‍वच्‍छ भारत मिशन (एसबीएम) का शुभारंभ किया था। एसबीएम का उद्देश्‍य भारत को ओडीएफ (खुले में शौच मुक्‍त) देश में तब्दील करने और 2 अक्‍टूबर, 2019 तक स्‍वच्‍छ भारत के लक्ष्‍य को प्राप्‍त करना है और इस तरह महात्‍मा गांधी की 150वीं जयंती पर उन्‍हें यथोचित श्रद्धांजलि अर्पित करना है।

इसके तहत मुख्‍य रूप से लोगों के नजरिये में बदलाव लाने पर फोकस किया जा रहा है, जो ओडीएफ संबंधी नतीजे प्राप्‍त करने का मौलिक साधन है। मंत्रालय अपने ध्यान केंद्रित सूचना, शिक्षा और संचार (आईईसी) कार्यक्रम के जरिये इसे हासिल करने के लिए प्रयासरत है। मंत्रालय महिला-पुरुष की दृष्टि से संवेदनशील माने जाने वाली सूचनाओं के साथ-साथ लोगों के व्‍यवहार अथवा नजरिये में बदलाव लाने से जुड़े दिशा-निदेर्शों और जन शिक्षा से जुड़ी विभिन्‍न गतिविधियों को भी बढ़ावा देता है। मंत्रालय ने वर्ष 2017 में महिला-पुरुष से संबंधित दिशा-निर्देश और वर्ष 2015 में स्रियों के मासिक धर्म से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए थे।

2 अक्‍टूबर, 2014 को एसबीएम (जी) के शुभारंभ के अवसर पर स्‍वच्‍छता कवरेज 38.70 प्रतिशत थी। यह कवरेज 18 दिसम्‍बर, 2017 तक बढ़कर 74.15 प्रतिशत हो गई है।


एसबीएम (जी) के तहत उपलब्धियां

568.15 - घरों में निर्मित शौचालय (लाख में) - 2 अक्‍टूबर, 2014 से लेकर अब तक

35.45 - प्रतिशत वृद्धि स्‍वच्‍छता कवरेज में - 2 अक्‍टूबर, 2014 से लेकर अब तक

255 - स्‍व-घोषित ओडीएफ जिलों की संख्‍या 

4470 - नमामि गंगे के तहत ओडीएफ गांव

8 - ओडीएफ राज्‍य/केन्‍द्र शासित प्रदेश (सिक्किम, हिमाचल प्रदेश, केरल, उत्तराखंड, हरि‍याणा, गुजरात, दमन एवं दीव और चंडीगढ़)

2,92,896 - स्‍व-घोषित ओडीएफ गांवों की संख्‍या


स्‍वच्‍छ भारत मिशन: सभी को स्‍वच्‍छता के लिए जिम्‍मेदार बनाना

पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय को एसबीएम-ग्रामीण के आवंटित प्रभार के अलावा ‘स्‍वच्‍छ भारत’ के लक्ष्‍य की प्राप्ति के लिए आवश्‍यक गतिविधियां आयोजित करने के साथ-साथ समस्‍त संबंधित गतिविधियों एवं पहलों में तालमेल बैठाने की जिम्‍मेदारी भी दी गई है। यह मंत्रालय इस जिम्‍मेदारी के निर्वहन के लिए अन्‍य सभी मंत्रालयों, राज्‍य सरकारों, स्‍थानीय संस्‍थानों, गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ), आस्‍था संगठनों, मीडिया और शेष हितधारकों के साथ मिलकर इस दिशा में निरंतर प्रयासरत है। यह दृष्टिकोण प्रधानमंत्री के इस आह्वान पर आधारित है कि स्‍वच्‍छता केवल स्‍वच्‍छता विभागों की ही नहीं, बल्कि सभी की जिम्‍मेदारी है। इस दिशा में बड़ी तेजी से अनगिनत विशेष पहल की गई हैं और विभिन्‍न परियोजनाएं शुरू की गई हैं। इस दिशा में समस्‍त हितधारकों की ओर से मिली प्रतिक्रिया को अत्‍यंत उत्‍साहजनक बताया जा रहा है।

स्‍वच्‍छता पखवाड़ा

स्‍वच्‍छता पखवाड़े का शुभारंभ अप्रैल, 2016 में हुआ था, जिसका उद्देश्‍य इस अवधि के दौरान अपने-अपने क्षेत्राधिकार में केन्‍द्रीय मंत्रालयों और विभागों का ध्‍यान स्‍वच्‍छता से जुड़े मसलों और तौर-तरीकों पर केन्द्रित करना था। इस पखवाड़े के दौरान वि‍भिन्‍न गतिविधियों के बारे में समुचित योजना बनाने में मदद करने के लिए विभिन्‍न मंत्रालयों के बीच एक वार्षिक कैलेंडर पहले ही जारी कर दिया गया था।

नमामि गंगे

नमामि गंगे कार्यक्रम जल संसाधन मंत्रालय की एक पहल है, जिसमें गंगा नदी के किनारे अवस्थित गांवों को ओडीएफ करना भी शामिल है। पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय द्वारा ठोस एवं तरल कचरे के प्रबंधन से जुड़े अनेक कार्य क्रियान्वित किये जा रहे हैं।

उत्‍तराखंड, उत्‍तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के 52 जिलों में फैले समस्‍त 4470 गांवों को राज्‍य सरकारों की सक्रिय मदद से ओडीएफ घोषित कर दिया गया है। मंत्रालय ने अब गंगा नदी के किनारे अवस्थित 24 गांवों पर अपना ध्‍यान केन्द्रित किया है, ताकि उन्‍हें एनएमसीजी के साथ समन्‍वय स्‍थापित करके ‘गंगा ग्राम’ में तब्‍दील किया जा सके।

स्‍वच्‍छता कार्य योजना (एसएपी)

स्‍वच्‍छता के लिए अपनी तरह का पहला अन्‍तर-मंत्रालय कार्यक्रम ‘एसएपी’ प्रधानमंत्री के इस विजन को साकार करने की दिशा में एक ठोस कार्य योजना है कि ‘स्‍वच्‍छता सभी की जिम्‍मेदारी है।' सभी केन्‍द्रीय मंत्रालयों/विभागों ने समुचित बजट प्रावधानों के जरिये उल्‍लेखनीय ढंग से इस सपने को साकार करने की दिशा में काम शुरू कर दिया है। वित्‍त मंत्रालय ने इसके लिए एक अलग बजट तैयार किया है। वित्‍त वर्ष 2017-18 के दौरान 77 मंत्रालयों/विभागों ने अपनी-अपनी एसएपी के लिए 12468.62 करोड़ रुपये की राशि मुहैया कराने की प्रतिबद्धता व्‍यक्‍त की है। एसएपी पर अमल 1 अप्रैल, 2017 से शुरू हुआ।

स्वच्छ प्रतीक स्थान (एसआईपी)

माननीय प्रधानमंत्री की प्रेरणा के तहत मंत्रालय ने एक बहु-हितधारक पहल की है, जिसके अन्‍तर्गत देश भर में अवस्थित ऐसे 100 स्‍थलों की साफ-सफाई पर ध्‍यान केन्‍द्रि‍त किया जा रहा है, जो अपनी धरोहर, धार्मिक और/अथवा सांस्‍कृतिक अहमियत की बदौलत ‘प्र‍तीक या प्रतिष्ठित’ स्‍थल माने जाते हैं।

इस पहल का लक्ष्‍य इन स्‍थलों पर साफ-सफाई के माहौल को बेहतरीन बनाना है। इस पहल पर शहरी विकास, पर्यटन एवं संस्‍कृति मंत्रालयों की सहभागिता के साथ अमल किया जा रहा है, जबकि पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय को इसके लिए प्रमुख मंत्रालय माना गया है। प्रथम दो चरणों में अब तक 20 प्रतीक (आइकोनिक) स्‍थलों पर काम शुरू किया गया है। वित्‍तीय एवं तकनीकी सहायता हेतु इन सभी 20 प्रतिष्ठित अथवा ऐतिहासिक स्‍थलों के लिए विशेष सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (पीएसयू) अथवा कम्‍पनियों को निर्दिष्‍ट किया गया है।

स्‍वच्‍छ शक्ति, 8 मार्च, 2017

‘स्‍वच्‍छ शक्ति’ का आयोजन अंतरराष्‍ट्रीय महिला दिवस पर 8 मार्च, 2017 को गांधीनगर स्थित महात्‍मा मंदिर में किया गया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने इस अवसर पर उपस्थित जन समुदाय को सम्‍बोधित किया। लगभग 6,000 चयनित महिला सरपंचों एवं देश भर से आए जमीनी स्तर पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं ने इस कार्यक्रम में भाग लिया। इस अवसर पर स्‍वच्‍छता के उन महारथियों को सम्‍मानित किया गया गया, जिन्‍होंने ग्रामीण भारत में ‘स्‍वच्‍छ भारत’ को एक सच्‍चाई में तब्‍दील करने के लिए उल्‍लेखनीय योगदान दिया है।

खुले में शौच से मुक्ति (एफओडी) का सप्‍ताह (9 अगस्‍त-15 अगस्‍त)

लोगों के व्‍यवहार अथवा नजरिये में तेजी से व्‍यापक बदलाव सुनिश्चित करने के उद्देश्‍य से घर-घर आईपीसी, स्‍वच्‍छता रथों, रैलियों, मैराथन, इस अभियान के महारथियों का अभिनंदन करना, जागरूकता पैदा करने के लिए प्रश्‍नोत्‍तरी/चित्रकला प्रतियोगिताएं और ग्रामीण इलाकों में समुदायों को एकजुट करना जैसी विभिन्‍न आईईसी गतिविधियां आयोजित की गईं।

‘स्‍वच्‍छ संकल्‍प से स्‍वच्‍छ सिद्ध‍ि’ प्रतियोगिता (17 अगस्‍त-8 सितम्‍बर)

माननीय प्रधानमंत्री ने ‘संकल्‍प से सिद्धि’ के तहत वर्ष 2022 तक एक ‘नए भारत’ का निर्माण करने का बिगुल बजा दिया है, जो ‘सभी तरह की गंदगी भारत छोड़ो’ के संकल्‍प को दर्शाता है। इस विजन को साकार करने के लिए पेयजल एवं स्‍वच्‍छता मंत्रालय ने 17 अगस्‍त से लेकर 8 सितम्‍बर, 2017 तक देश भर में फिल्‍म, लेख एवं चित्रकला प्रतियोगिता का आयोजन किया, जो स्‍वच्‍छता को एक जन आंदोलन बनाने की दिशा में एक और प्रमुख कदम है।

‘दरवाजा बंद’ मीडिया अभियान

लोगों के व्‍यवहार अथवा नजरिये में बदलाव लाने के उद्देश्‍य को ध्‍यान में रखते हुए ‘दरवाजा बंद’ नामक एक आक्रामक जन मीडिया अभियान शुरू किया गया, जिसमें अमिताभ बच्‍चन को विशेषकर पुरुषों द्वारा शौचालय का निरंतर उपयोग करने के लिए प्रोत्‍साहित करते हुए दर्शाया गया है। इस अभियान में हिन्‍दी सहित 9 भाषाओं में 5 टीवी एवं रेडियो स्‍पॉट शामिल हैं। इस अभियान को देश भर में मास मीडिया पर सफलतापूर्वक शुरू किया गया है।


स्‍वच्‍छता ही सेवा (एसएचएस), 16 सितम्‍बर-2 अक्‍टूबर, 2017

माननीय प्रधानमंत्री ने 27 अगस्‍त, 2017 को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में देशवासियों से स्‍वच्‍छता की भावना अपनाने एवं ‘श्रमदान’ करने का आह्वान किया और समस्‍त एनजीओ, स्‍कूलों, कॉलेजों, सामाजिक, सांस्‍कृतिक व राजनीतिक नेताओं, कम्‍पनियों, सरकारी अधिकारियों, कलक्‍टरों और सरपंचों से 15 सितम्‍बर से लेकर 2 अक्‍टूबर, 2017 तक की अवधि के दौरान स्‍वच्‍छता से जुड़ी गतिविधियों में तेजी लाने का अनुरोध किया। प्रधानमंत्री श्री नरेन्‍द्र मोदी ने वाराणसी के शहंशाहपुर गांव में दोहरे गड्ढे वाले शौचालय के निर्माण के लिए श्रमदान कर इस अभियान की अगुवाई की। उन्‍होंने यह टिप्‍पणी की कि ‘‘स्‍वच्‍छता को ‘स्‍वभाव’ बनाना होगा- अपने देश को स्‍वच्‍छ बनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।’’ एसएचएस को देशवासियों की ओर से भरपूर समर्थन मिला और देश भर में रक्षा बलों एवं दिव्‍यांगजनों सहित तमाम लोगों ने इसके लिए बड़े पैमाने पर एकजुटता दिखाते हुए विभिन्‍न गतिविधियों के जरिये स्‍वच्‍छता और साफ-सफाई के लिए स्‍वयंसेवक के तौर पर श्रमदान किया।

जानिए महाराष्ट्र के दलित क्यों मनाते हैं 1 जनवरी को 'विजय दिवस'। क्या है कोरेगांव का युद्ध?


क्या है कोरेगांव का युद्ध? जब अंग्रेजों की ओर से लड़े थे 834 (जिसमें 500 महार (दलित) जाती के लोग) और हारी थी 28000 की पेशवा सेना


नए साल की शुरूआत महाराष्ट्र के कई जिलों में जातीय हिंसा से हुई। 1 जनवरी 1818 यानि ठीक दो सौ साल पहले कोरेगांव में हुई जंग को लेकर पुणे एक बार फिर जंग का मैदान बन गया। कोरेगांव के युद्ध में जिन भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया था उनके वंशज जीत का जश्न मनाने यहाँ जमा हुए।

दूसरे पक्ष के लोग भी यहाँ आए थे। किसी अनहोनी की आशंका से पुलिस का भारी बंदोबस्त था,लेकिन भीड़ का आंकड़ा करीब तीन से साढ़े तीन लाख तक पहुँच गया और अचानक हालात बिगड़ गए। पुलिस की तमाम कोशिशों के बावजूद हिंसा और आगजनी नहीं रुकी। कई गाड़ियों को आग लगा दी गई जबकि एक युवक की हत्या की भी खबर है।

1 जनवरी 1818 में कोरेगांव की लड़ाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के पेशवा गुट के बीच कोरेगांव भीमा में लड़ी गई थी। बता दें कि यही वो जगह है जहाँ पर अछूत कहलाए जाने वाले महारों ने पेशवा बाजीराव द्वितीय के सैनिकों को मात दे दी थी। ये महार अंग्रेजों की ईस्ट इंडिया कंपनी की ओर से लड़ रहे थे और इसी युद्ध के बाद पेशवाओं के राज का अंत हुआ था।
क्या है कोरेगांव का युद्ध ?
  • अंग्रेज सेना और पेशवा बाजीराव द्वितीय सेना के बीच हुआ युद्ध
  • मराठा योद्धा पेशवा बाजीराव द्वितीय की फौज में 28000 सैनिक थे
  • अंग्रेजों के कब्जे वाले पुणे पर हमला करने जा रहे थे पेशवा बाजीराव द्वितीय
  • बाजीराव के सैनिकों को रोकने के लिए आए अंग्रेजों के 834 (जिसमें 500 महार जाती के लोग) सैनिक
  • अंग्रेजों की सेना में ज्यादातर सैनिक महाराष्ट्र के दलित समुदाय के थे
  • पेशवा ने अंग्रेजों की सेना से लड़ने अपने दो हजार निपुण सैनिकों की टुकड़ी भेजी
  • पेशवा बाजीराव द्वितीय के 2000 सैनिकों में अरब, गोसाईं और मराठा लड़ाके
  • 500 अंग्रेज सैनिकों ने 12 घंटे तक बाजीराव द्वितीय मराठा सेना को रोका
  • अंग्रेज सेना की बड़ी टुकड़ी आने की आशंका से बाजीराव ने पुणे कूच का इरादा टाला
  • कोरेगांव के युद्ध को महाराष्ट्र के दलित अपनी बहादुरी की जीत के तौर पर मनाते हैं
  • कोरेगांव के युद्ध की जीत की याद में अंग्रेजों ने कोरेगांव में विजय स्तंभ बनाया
  • इसी विजय स्तंभ पर हर साल दलित अपनी बहादुरी का जश्न मनाने आते हैं
  • दलितों के अंग्रेजों का साथ देने को मराठा समुदाय देश विरोधी मानता है

पेशवा बाजीराव द्वितीय की अगुवाई में 28 हज़ार मराठा पुणे पर हमला करने की योजना बना रहे थे। रास्ते में उन्हें 834 सैनिकों से सजी कंपनी फोर्स मिली, जो पुणे में ब्रिटिश सैनिकों की ताकत बढ़ाने के लिए जा रही थी।पेशवा ने कोरेगांव में मौजूद कंपनी फोर्स पर हमला करने के लिए अपने 2 हजार सैनिक भेजे। कप्तान फ्रांसिस स्टॉन्टन की अगुवाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की इस टुकड़ी ने करीब 12 घंटे तक अपनी पोजीशन संभाले रखी और मराठाओं को कामयाब नहीं होने दिया। बाद में मराठाओं ने फैसला बदला और कदम खींच लिए। क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि जनरल जोसफ स्मिथ की अगुवाई में बड़ी ब्रिटिश टुकड़ी वहाँ पहुँच जाएगी जिससे मुकाबला आसान नहीं होगा। इस टुकड़ी में भारतीय मूल के जो फौजी थे, उनमें महार दलित थे और वो बॉम्बे नेटिव इन्फैंट्री से ताल्लुक रखते थे। ऐसे में दलित कार्यकर्ता इस घटना को दलित इतिहास का अहम हिस्सा मानते हैं।

अस्मिता की लड़ाई
जो इतिहासकार महारों और पेशवा फौजों के बीच हुए इस युद्ध को विदेशी आक्रांता अँग्रेजजों के खिलाफ भारतीय शासकों के युद्ध के तौर पर देखते हैं, तथ्यात्मक रूप से वो गलत नहीं हैं। लेकिन जानकार मानते हैं कि महारों के लिए ये अँग्रेजों की नहीं बल्कि अपनी अस्मिता की लड़ाई थी।
अंत्यजों यानी वर्णव्यवस्था से बाहर माने गए 'अस्पृश्यों' के साथ जो व्यवहार प्राचीन भारत में होता था, वही व्यवहार पेशवा शासकों ने महारों के साथ किया।

इतिहासकारों ने कई जगहों पर ब्यौरे दिए हैं कि नगर में प्रवेश करते वक़्त महारों को अपनी कमर में एक झाड़ू बाँध कर चलना होता था ताकि उनके 'प्रदूषित और अपवित्र' पैरों के निशान उनके पीछे घिसटने इस झाड़ू से मिटते चले जाएँ। उन्हें अपने गले में एक बरतन भी लटकाना होता था ताकि वो उसमें थूक सकें और उनके थूक से कोई सवर्ण 'प्रदूषित और अपवित्र' न हो जाए वो सवर्णों के कुएँ या पोखर से पानी निकालने के बारे में सोच भी नहीं सकते थे।

'मराठा नहीं ब्राह्मणों के ख़िलाफ़ थी लड़ाई'

इतिहासकार और आलोचक प्रो. रुषिकेश काम्बले कोरेगांव भीमा का दूसरा पक्ष भी बताते हैं। उनका दावा है कि कि महारों ने मराठों को नहीं बल्कि ब्राह्मणों को हराया था। ब्राह्मणों ने छुआछूत जबरन दलितों पर थोप दिया था और वो इससे नाराज थे। जब महारो ने ब्राह्मणों से इसे खत्म करने को कहा तो वे नहीं माने और इसी वजह से वो ब्रिटिश फौज से मिल गए।
ब्रिटिश फौज ने महारों को ट्रेनिंग दी और पेशवाई के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा दी। मराठा शक्ति के नाम पर जो ब्राह्मणों की पेशवाई थी ये लड़ाई दरअसल, उनके खिलाफ थी और महारों ने उन्हें हराया। ये मराठाओं के खिलाफ लड़ाई तो कतई नहीं थी।
महारों और मराठाओं के खिलाफ किसी तरह का मतभेद या झगड़ा था, ऐसा इतिहास में कहीं नहीं है। अगर ब्राह्मण छुआछूत खत्म कर देते तो शायद ये लड़ाई नहीं होती।


मराठाओं का नाम इसमें इसलिए लाया जाता है क्योंकि ब्राह्मणों ने मराठाओं से पेशवाई छीनी थी। ये आखिरी पेशवा ताकत थी और ब्रिटिश उन्हें हराना चाहते थे। इसीलिए ब्रितानी फौज ने महारों को साथ लिया और पेशवा राज खत्म कर दिया।