Thursday, 25 May 2017

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन


भारत सरकार ने, खाद्यान्न उत्पादन में आई स्थिरता एवं बढ़ती जनसंख्या की खाद्य उपभोग को ध्यान में रखते हुए, अगस्त 2007 में केन्द्र प्रायोजित राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन योजना का शुभारंभ किया। इस योजना का मुख्य लक्ष्य सुस्थिर आधार पर गेहूँ, चावल व दलहन की उत्पादकता में वृद्धि लाना ताकि देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति को सुनिश्चित किया जा सके। इसका दृष्टिकोण समुन्नत प्रौद्योगिकी के प्रसार एवं कृषि प्रबंधन पहल के माध्यम से इन फसलों के उत्पादन में व्याप्त अंतर को दूर करना है।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के मुख्य घटक
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तीन घटक होंगे-
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- चावल
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन– गेहूँ
  • राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन– दलहन
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के लिए 11वीं पंचवर्षीय योजना अवधि (2007-08 से 2011-12) के लिए वित्तीय निहितार्थ 4882.48 करोड़ रुपये की होगी। इसके लिए लाभुक किसान उन जमीन पर शुरू की गई गतिविधियों पर आने वाली कुल लागत का 50 प्रतिशत भाग का वहन करेंगे अर्थात् उन्हें आधा हिस्सा देना होगा। लाभुक किसान इसके लिए बैंक से ऋण भी प्राप्त कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी की राशि बैंकों को जारी की जाएगी। इस योजना के क्रियान्वयन के परिणामस्वरूप वर्ष 2011-12 तक चावल के उत्पादन में 10 मिलियन टन, गेहूँ के उत्पादन में 8 मिलियन टन व दलहन के उत्पादन में 2 मिलियन टन की वृद्धि होगी। साथ ही, यह अतिरिक्त रोजगार के अवसर भी उत्पन्न करेगा।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के अंतर्गत शामिल किये गये राज्य
राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- चावल के अंतर्गत 14 राज्यों के 142 जिले (आँध्र प्रदेश, असोम, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश,5उड़ीसा, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल) शामिल होंगे।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन- गेहूँ के अंतर्गत 9 राज्यों के 142 जिले (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र व पश्चिम बंगाल) शामिल किये जाएंगे।

राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन– दलहन योजना के अंतर्गत 16 राज्यों के 468 जिले (आँध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, राजस्थान, तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश व पश्चिम बंगाल) शामिल किये जाएंगे।
इस योजना के अंतर्गत इन जिलों के 20 मिलियन हेक्टेयर धान के क्षेत्र, 13 मिलियन हेक्टेयर गेहूँ के क्षेत्र व 4.5 मिलियन हेक्टेयर दलहन के क्षेत्र शामिल किये गये हैं जो धान व गेहूँ के कुल बुआई क्षेत्र का 50 प्रतिशत है। दलहन के लिए अतिरिक्त 20 प्रतिशत क्षेत्र का सृजन किया जाएगा।

राष्ट्रीय बागवानी मिशन
  • भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय बागवानी मिशन की शुरुआत वर्ष 2005-06 (दसवीं योजना) के दौरान केन्द्र प्रायोजित योजना के रूप में की गई है। इस योजना का उद्देश्य भारत में बागवानी क्षेत्र का व्यापक वृद्घि करने के साथ-साथ बागवानी उत्पादन में वृद्घि करना है। 11 वीं योजना के दौरात भारत सरकार की सहायता का अंश 85 प्रतिशत तथा राज्य सरकारों का अंशदान 15 प्रतिशत होगा। 
  • उत्तर पूर्व के आठ राज्यों को छोड़कर (सिक्किम, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड समेत) सभी राज्य तथा केंद्र शासित प्रदेशों को इस मिशन के अंतर्गत लाया गया है। उपरोक्त छूटे हुए सभी राज्यों को “उत्तर-पूर्व राज्यों में उद्यान विज्ञान के एकीकृत विकास हेतु तकनीकी मिशन” नामक अभियान के तहत लाया गया है।

ई-विन परियोजना


मई, 2017 में पांच देशों नामतः फिलीपींस, थाईलैंड, इंडोनेशिया, बांग्लादेश और नेपाल का एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल भारत आया। प्रतिनिधिमंडल की भारत यात्रा का उद्देश्य भारत की स्वदेश में विकसित ई-विन परियोजना के संबंध में जानकारी प्राप्त करना था। यह प्रतिनिधिमंडल स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव से मुलाकात कर ई-विन परियोजना के भारत में कार्यान्वयन के संबंध में जानकारी प्राप्त की। साथ ही इस संबंध में भी परिचर्चा की कि किस प्रकार वे अपने देश में इस परियोजना का कार्यान्वयन कर सकते हैं।
ई-विन परियोजना
  • ई-विन (Electronic Vaccine Intelligence Network : E-VIN) भारत की स्वदेश में विकसित तकनीक प्रणाली है जो टीका भंडारों का डिजिटलीकरण करती है और स्मार्टफोन के माध्यम से कोल्ड चेन (Cold Chain) की निगरानी करती है।
  • भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा अपने ‘सार्वभौम टीकाकरण कार्यक्रम’ (Universal Immunisation Programme : UIP) के तहत 12 राज्यों में ई-विन परियोजना का कार्यान्वयन किया जा रहा है।
  • अक्टूबर, 2015 में प्रारंभ हुई यह परियोजना असम, बिहार, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, मणिपुर, नगालैंड, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 371 जिलों में लागू की गई है।
  • ई-विन परियोजना का लक्ष्य उपर्युक्त राज्यों में टीका भंडार एवं वितरण और सभी ‘कोल्ड चेन प्वॉइंट्स’ (Cold Chain Points) में भंडारण तापमान पर वास्तविक समय जानकारी प्रदान कर ‘सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम’ की सहायता करना है।
  • साथ ही भारत में नए प्रतिजनों (Antigens) के लिए टीका वितरण, खरीद और योजना में संशोधित नीति के साक्ष्य आधार को मजबूत बनाना है।
  • तकनीकी नवाचार ‘ई-विन’ का भारत में कार्यान्वयन संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (United Nations Development Programme : UNDP ) द्वारा ‘गावि-द वैक्सीन एलायंस (GAVI-The Vaccine Alliance) की वित्तीय सहायता से किया जा रहा है।
  • आगामी वर्षों में देश के 17 राज्यों और 7 संघ क्षेत्रों में ई-विन परियोजना को लागू किया जाएगा।
ई-विन की आवश्यकता
  • भारत में 65 प्रतिशत बच्चों का पूर्णतया टीकाकरण किया जा चुका है जबकि भारत सरकार का लक्ष्य प्रति वर्ष 27 मिलियन बच्चों का टीकाकरण करना है।
  • यद्यपि भारत में पोलियो के उन्मूलन और नवजात टिटनेस (Neonatal Tetanus) को समाप्त करने की दिशा में पर्याप्त प्रगति हुई है फिर भी देश में 10 मिलियन बच्चों का कम टीकाकरण हुआ है।
  • देश में बच्चों के कम टीकाकरण के कारणों में शामिल हैं अस्पतालों में गुणवत्तापूर्ण टीकों की कमी, टीका भंडार दृश्यता की कमी, खराब वितरण योजना एवं अनुपयुक्त भंडारण की स्थिति समेत मौजूदा आपूर्ति शृंखला की कमजोरियां।
  • शत-प्रतिशत टीकाकरण के अपने दृष्टिकोण को साकार करने हेतु भारत के समक्ष एक महत्वपूर्ण चुनौती है अपर्याप्त टीका आपूर्ति और टीका भंडारण स्थलों की तापमान निगरानी प्रणाली का समाधान करना।
  • इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए एक ‘राष्ट्रीय टीका संचालन प्रबंधन प्रणाली’ (National Vaccine Logistic Management System) की आवश्यकता थी सभी ‘कोल्ड चेन प्वॉइंट्स पर वास्तविक समय टीका भंडार की दृश्यता प्रदान करती हो।
  • इसी आवश्यकता के मद्देनजर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा ‘ई-विन’ परियोजना का कार्यान्वयन किया जा रहा है।
  • ई-विन परियोजना के सफल कार्यान्वयन के माध्यम से भारत न केवल अपने शत-प्रतिशत टीकाकरण के लक्ष्य को पूरा कर सकता है बल्कि अन्य देशों को भी ई-विन परियोजना से लाभान्वित कर सकता है। भारत की यात्रा पर आए पांच देशों के अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने आश्वासन दिया कि मंत्रालय उनकी क्षमताओं को मजबूत बनाने और उनके कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने हेतु उन्हें सहयोग एवं समर्थन देने हेतु तैयार है।

WHO ग्लास (GLAAS) रिपोर्ट, 2017


‘स्वच्छता एवं पेयजल का वैश्विक विश्लेषण तथा आकलन’ (GLAAS) संयुक्त राष्ट्र-जल (UN-Water) की एक पहल है। इस पहल का क्रियान्वयन ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ (WHO) द्वारा किया जाता है। ग्लास (GLAAS) का उद्देश्य सभी स्तरों पर नीति निर्माताओं को निवेश का एक विश्वसनीय, सर्वसुलभ, व्यापक एवं वैश्विक विश्लेषण प्रदान करना है। साथ ही स्वच्छता, पेयजल एवं स्वास्थ्य रक्षा के लिए वातावरण (Environment) को सक्षम बनाना है। हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा ‘ग्लास (GLAAS), 2017’ रिपोर्ट जारी की गई।
  • 13 अप्रैल, 2017 को जेनेवा में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा संयुक्त राष्ट्र-जल (UN-Water) की ओर से ‘स्वच्छता एवं पेयजल का वैश्विक विश्लेषण तथा आकलन’ (GLAAS : Global Analysis and Assessment of Sanitation and Drinking Water), 2017 प्रकाशित की गई।
  • ‘संयुक्त राष्ट्र-जल’ स्वच्छता समेत ताजे जल (Fresh Water) से संबंधित मुद्दों के लिए संयुक्त राष्ट्र अंतर-एजेंसी समन्वय-तंत्र है।
  • ग्लास, 2017 रिपोर्ट में 75 देशों और 25 बाह्य सहायता एजेंसियों (ESA : External Support Agency) का ‘सतत विकास लक्ष्यों’ (SDG) के तहत स्वच्छता एवं पेयजल के सार्वभौमिक उपयोग के वित्तपोषण से संबंधित विश्वसनीय एवं अद्यतन आंकड़ा प्रस्तुत किया गया है।
  • रिपोर्ट के अनुसार, लगभग 2 बिलियन लोग दूषित पेयजल का उपयोग करते हैं जिसके कारण उन्हें हैजा, पेचिश, टायफाइड एवं पोलियो होने का खतरा है।
  • अनुमान है कि प्रति वर्ष हैजे से होने वाली 5 लाख मौतों का कारण दूषित पेयजल है।
  • यदि वित्तीय संसाधनों का अधिक कुशलता से उपयोग करने और वित्तीयन के नए स्रोतों की पहचान करने के प्रयासों को बढ़ाने के कदम नहीं उठाए जाते, तो सुरक्षित पेयजल एवं स्वच्छता तक सार्वभौमिक पहुंच की वैश्विक आकांक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकेगा।
  • रिपोर्ट के अनुसार, विगत तीन वर्षों में देशों ने 4.9 प्रतिशत की वार्षिक औसत दर से जल, स्वच्छता और स्वच्छता के लिए अपने बजट में वृद्धि की है।
  • 80 प्रतिशत देशों ने रिपोर्ट किया है कि ‘जल, स्वच्छता एवं स्वास्थ्य रक्षा’ (WASH : Water, Sanitation and Hygiene) वित्तपोषण अभी भी ‘वॉश’ (WASH) सेवाओं हेतु राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने के लिए अपर्याप्त है।
  • जल एवं स्वच्छता पर ‘आधिकारिक विकास सहायता’ (ODA : Official Development Assistance) खर्च वर्ष 2012 के 6.3 बिलियन डॉलर से बढ़कर वर्ष 2015 में 7.4 बिलियन डॉलर हो गया है।

Wednesday, 24 May 2017

भारत का पहला राज्य-जानिये महत्वूपर्ण तथ्य (GK Q & A, भाग-62)


भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति एवं स्वरुप वर्तमान परिप्रेक्ष्य में


आजादी के बाद से भारत की अर्थव्यवस्था एक 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' रही है। भारत के बड़े सार्वजनिक क्षेत्र 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' को सफल बनाने के लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था, मूल रूप से सेवा क्षेत्र (वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद का 60% हिस्सा प्रदान करता है) के योगदान और कृषि (जनसंख्या के लगभग 53% लोग) पर निर्भर है । ज्यों-ज्यों समय बीत रहा है वैसे-वैसे अर्थव्यवस्था में कृषि की हिस्सेदारी कम हो रही है तथा सेवा क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ रही है। वर्तमान में भारतीय अर्थव्यवस्था को विश्व की एक विकासशील अर्थव्यवस्था कहा जाता है।
  • स्वतंत्रता के बाद से ही भारत की अर्थव्यवस्था एक 'मिश्रित अर्थव्यवस्था' रही है। भारत के बड़े सार्वजनिक क्षेत्र अर्थव्यवस्था के लिए रोजगार और राजस्व प्रदान करने के प्रमुख कारक रहे हैं।
  • विश्व व्यापार संगठन के अनुमानों के अनुसार वैश्विक निर्यात और आयात में भारत की हिस्सेदारी में क्रमश: 0.7% और 0.8% की वृद्धि हुई है जो 2000 में 1.7% थी और 2012 में 2.5% हो गई थी।
  • आजादी के बाद से ही भारतीय अर्थव्यवस्था का परिदृश्य सोवियत संघ की कार्यप्रणाली से प्रेरित रहा था। 1980 के दशक तक विकास दर 5 से अधिक नहीं थी। कई अर्थशास्त्रिययों द्वारा इस स्थिर विकास को 'हिंदू विकास दर' कहा गया था।
  • 1992 के दौरान देश में उदारीकरण के दौर की शुरुआत हुई। इसके बाद, अर्थव्यवस्था में सुधार होना शुरू हो गया था। विकास दर के इस नए चलन को 'नई हिंदू विकास दर' कहा जाता था।
  • भारत की अर्थव्यवस्था में पारंपरिक ग्रामीण खेती, आधुनिक कृषि, हस्तशिल्प, आधुनिक उद्योगों की एक विस्तृत श्रृंखला और कई सेवाओं के विभिन्न क्षेत्र शामिल हैं।
  • सेवा क्षेत्र आर्थिक विकास का प्रमुख स्रोत हैं। इसमें भारतीय अर्थव्यवस्था के आधे से ज्यादा उत्पादन के साथ श्रम शक्ति का एक तिहाई भाग शामिल है।
  • वर्तमान में सकल घरेलू उत्पाद की कारक लागत (फैक्टर कॉस्ट), (2004-05के मूल्यानुसार) 5748564 करोड़ रुपए है (आंकड़ा 2013-14)
  • प्रति व्यक्ति आय (वर्तमान मूल्यानुसार) 74,920 रुपये है। (2013-14)
  • 2011-12 की सकल घरेलू बचत दर 30.8% है। (प्रतिशत के रूप में सकल घरेलू उत्पाद का़ वर्तमान बाजार मूल्य)
  • तृतीयक क्षेत्र सकल घरेलू उत्पादन में लगभग 60% का योगदान देता है। (2012-13)
  • कुल खाद्यान्न उत्पादन 265 मिलियन टन (2013-14) है।
  • कुल वैश्विक निर्यात में भारतीय व्यापार का हिस्सा 1.8% है।
  • विश्व के कुल आयात में भारत की हिस्सेदारी 2.5% है।
  • भारत की आबादी का कुल आकार 1.26 बिलियन (2014) है।
  • वर्ष 2015 की पहली छमाही के दौरान नई परियोजनाओं में अमेरिका और चीन को पछाड़ते हुए भारत में सभी देशों के बीच सर्वाधिक एफडीआई प्रवाह देखा गया। पिछले वर्ष की छमाही के 12 बिलियन डॉलर के मुकाबले 2015 में 31 बिलियन डॉलर का व्यय विदेशी कंपनियों द्वारा किया गया। जबकि इसी अवधि के दौरान चीन और अमेरिका में क्रमश: 28 और 27 बिलियन डॉलर का विदेशी निवेश हुआ।
  • 2015 में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 330 बिलियन डॉलर का रहा जो कि इस समय (अप्रैल 2016) में अब तक के सर्वोच्च स्तर 355 बिलियन डॉलर पर खड़ा है।
  • इंजीनियरिंग, पेट्रोलियम, रत्न एवं आभूषण, कपड़ा और औषधि शीर्ष पांच क्षेत्रों में वैश्विक मांग में कमी के कारण अगस्त 2015 में लगभग 25 फीसदी की गिरावट आई जो घटकर 13.33 बिलियन डॉलर हो गई। 2014-15 के दौरान इन पांच कारकों का कुल निर्यात में लगभग 66 फीसदी का योगदान था। पिछले वर्ष अगस्त में इन क्षेत्रों से कुल निर्यात 17.79 बिलियन डॉलर का रहा था।

  • रंगराजन समिति की सिफारिशों (ग्रामीण क्षेत्रों में एक दिन में 32 रुपये/दिन खर्च करने वाले और कस्बों तथा शहरों में 47 रुपये/दिन खर्च करने वाले लोगों को गरीब नहीं माना जाना चाहिए) के परिणामस्वरूप गरीबी रेखा से नीचे की आबादी में वृद्धि हुई है। इसमें तेंदुलकर समीति के 270 मिलियन आबादी के मुकाबले यह 2011-12 में 35 फीसदी की वृद्धि के साथ यह बढकर 363 बिलियन हो गई।
  • रंगराजन समिति द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार भारत की 29.5 फीसदी जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करती है जबकि 2009-10 में तेंदुलकर समीति के अनुसार यह 21.9 फीसदी थी। रंगराजन के अनुसार कुल आबादी में बीपीएल समूह की हिस्सेदारी 38.2 फीसदी की थी जिसमें दो साल की अवधि के दौरान गरीबी में 8.7 प्रतिशत अंकों की गिरावट दर्ज की गई।

भारतीय अर्थव्यवस्था एक मिश्रित अर्थव्यवस्था (सार्वजनिक और निजी क्षेत्र का संयोजन) है। अपनी प्रकृति के कारण वर्तमान में भारत की अर्थव्यवस्था को दुनिया की सबसे विकसित अर्थव्यवस्था के रूप में जाना जाता है। कुल सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का हिस्सा घटता जा रहा है जबकि सेवा क्षेत्र का हिस्सा बढ़ता जा रहा है या सकल घरेलू उत्पाद में तृतीयक क्षेत्र के योगदान में प्रतिवर्ष वृद्धि हो रही है (इसे भारत के विकसित होने के संकेत के रूप में देखा जाता है)।

Tuesday, 23 May 2017

"मौर्यकाल" (GK Q & A, भाग-61)


राष्ट्रीय किसान नीति- 2007


यह नीति कृषि क्षेत्र को फिर से सशक्त करने और किसानों की आर्थिक दशा सुधारने के उद्देश्य से बनाई गई है।
पृष्ठभूमि

  • सरकार ने 2004 में किसानों पर राष्ट्रीय आयोग का गठन प्रो. एम.एस.स्वामीनाथन की अध्यक्षता में किया था। आयोग के गठन के पीछे देश के विविध कृषि-उत्पाद क्षेत्रों में अलग कृषि व्यवस्था में उत्पादन, लाभ और दीर्घकालिकता को बढ़ावा देने की सोच थी। साथ ही, ऐसे उपाय भी सुझाना था ताकि शिक्षित और युवावर्ग को खेती की तरफ आकर्षित कर उसे अपनाये रखने के लिए मनाया जा सके। इसके अलावा एक वृहद् मध्यम अवधि का रणनीति अपनाई जाए, ताकि खाद्य और पोषण सुरक्षा को सुनिश्चित किया जा सके। आयोग ने अपनी अंतिम प्रतिवेदन अक्तूबर 2006 में सरकार को सौंपी।
  • आयोग द्वारा पुनरीक्षित किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति के प्रस्तावों और कई केन्द्रीय मंत्रालयों, विभागों और राज्य सरकारों की टिप्पणी/सुझाव के आधार पर भारत सरकार ने किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति -2007 की संकल्पना और मंजूरी दी। दूसरी बातों के अलावा यह नीति किसानों की आर्थिक दशा में उत्पादन, लाभ, पानी, जमीन और दूसरी सहायक सुविधाओं में इजाफा कर अहम बदलाव लाने का लक्ष्य रखती है। साथ ही, यह उचित मूल्य नीति व आपदा प्रबंधन जैसे उपाय भी करता है।
नीति की मुख्य बातें
किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति 2007 की बातें और प्रावधान इस प्रकार हैं-

मानवीय पक्ष- मुख्य जोर किसानों की आर्थिक दशा सुधारने पर रहेगा, न कि केवल उत्पादन और उत्पादकता केन्द्र में रहेगी और यह किसानों के लिए नीति निर्धारण की मुख्य कसौटी होगी।

किसानों की परिभाषा- यह क्षेत्र में संलग्न हर आदमी को शामिल करती है ताकि उनको भी नीति का फायदा मिल सके।

संपत्ति सुधार- यह सुनिश्चित करने के लिए कि गाँवों का हरेक पुरुष या महिला-खासकर गरीब या तो उत्पादक संपत्ति का मालिक हो या उस तक पहुँच रखता हो।

जल की हरेक इकाई पर कमाई- पानी की हरेक ईकाई के साथ उपज को अधिकतम करने का विचार हरेक फसल के उत्पादन में अपनाया जाएगा। साथ ही, पानी के अधिकतम इस्तेमाल के बारे में जागरूकता फैलाने पर भी जोर दिया जाएगा।

सूखा कोड, बाढ़ का कोड और अच्छे मौसम का कोड- यह सूखा और बाढ़ग्रस्त इलाकों में लागू किया जाएगा, साथ ही, ऊसर इलाकों में भी इसे लागू किया जाएगा। इसका उद्देश्य मॉनसून का अधिकतम लाभ उठाना और संभावित खतरों से निबटना है।

तकनीक का इस्तेमाल- नयी तकनीक के इस्तेमाल से भूमि और जल की प्रति ईकाई उत्पादन को बढ़ाना है। जैव-प्रौद्योगिकी, संचार व सूचना प्रौद्योगिकी (आई.सी.टी), पुनरुत्पादन के लायक ऊर्जा तकनीक, आकाशीय तकनीक और नैनो-तकनीक के इस्तेमाल से एवरग्रीन रेवोल्यूशन (हमेशा हरित क्रांति) की स्थापना की जाएगी। इससे बिना पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचाए उत्पादन को बढ़ाया जा सकेगा।

राष्ट्रीय कृषि जैव-सुरक्षा व्यवस्था- यह एक समन्वित कृषीय जैव-सुरक्षा कार्यक्रम की व्यवस्था के लिए स्थापित होगा।

भूमि की देखभाल हेतु सेवाएँ और निवेश- अच्छी गुणवत्ता के बीज, रोगमुक्त रोपण सामग्री-जिसमें हरित गृह में उगाए बीज (इन-विट्रो प्रोपैग्युल) और मिट्टी की गुणवत्ता को बढ़ाकर छोटे खेतों की उत्पादकता बढ़ाई जाएगी। हरेक किसान परिवार को मिट्टी के गुणवत्ता की जानकारी देनेवाला पासबुक दिया जाएगा।

महिलाओं के लिए सहायक व्यवस्था- जब महिलाएँ दिनभर जंगलों या खेतों में काम करती हैं तो उनको सहायक सुविधाएँ जैसे, क्रेचेज, पर्याप्त पोषण और बच्चों के देखभाल की जरूरत होती है।

ऋण एवं बीमा

  • ऋण की सलाह देनेवाले केन्द्र वहाँ स्थापित किए जाएंगे, जहाँ भारी कर्ज में डूबे किसानों को ऋण राहत पैकेज दिया जाएगा, ताकि वे कर्ज के जाल से निकल सकें। ऋण और बीमा के बारे में जानकारी के लिए ज्ञान चौपाल स्थापित किए जाएंगे।
  • खेतों में स्कूल की स्थापना की जाएगी ताकि किसान से किसान सीख सकें और प्रसार की सुविधा भी मजबूत की जा सके।

किसानों के लिए समन्वित राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा योजना- इससे किसानों को बीमारी और बुढ़ापे वगैरह में बीमा के जरिए आजीविका सुनिश्चित कराया जा सकेगा।

न्यूनतम समर्थन मूल्य- पूरे देश में प्रभावी तरीके से ऐसी व्यवस्था की जाएगी, ताकि किसानों को कृषि उत्पाद का उचित मूल्य मिल सके।

एकीकृत राष्ट्रीय बाजार- आंतरिक नियंत्रण और रोकों को हटाकर पूरे देश में एकीकृत बाजार की व्यवस्था
खाद्य सुरक्षा को व्यापक बनाना- जिसमें पोषक फसलों जैसे बाजरा, जवार, रागी और कोदो को भी शामिल किया जाएगा जो शुष्क भूमि में उगाए जाते हैं।

भविष्य के किसान- किसान सहकारी खेती अपना सकते हैं, सेवा सहकारिता बना सकते हैं, स्वयं सहायता समूह के जरिए सामूहिक खेती कर सकते हैं, छोटी बचत वाली संपत्ति बना सकते हैं, निविदा खेती को अपना सकते हैं और किसानों की कंपनी बना सकते हैं। इससे उत्पादन बढ़ने की उम्मीद है, छोटे किसानों की क्षमता में बढ़ोतरी होने और कई तरह की आजीविकाओं के निर्माण की भी संभावना है। यह कृषि उत्पाद संशोधन और एकीकृत कृषि व्यवस्था के जरिए होगा। खाद्य सुरक्षा पर एक कैबिनेट समिति बनाई जाएगी

नीति के क्रियान्वयन की व्यवस्था
नीति के क्रियान्वयन के लिए कृषि और सहकारिता विभाग एक अंतर्मंत्रालयीय समिति का गठन किया जाएगा, जो इस ध्येय के लिए आवश्यक योजना बनाएगी। कृषि समन्वयन समिति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में किसानों के लिए राष्ट्रीय नीति के एकीकृत क्रियान्वयन का समन्वय और समीक्षा करेगी।

Monday, 22 May 2017

"भारतीय कृषि" (GK Q & A, भाग-60)


Sunday, 21 May 2017

"मेक इन इंडिया"


मेक इन इंडिया का मकसद देश को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाना है। घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों को मूल रूप से एक अनुकूल माहौल उपलब्ध कराने का वायदा किया गया है ताकि 125 करोड़ की आबादी वाले मजबूत भारत को एक विनिर्माण केंद्र के रूप में परिवर्तित करके रोजगार के अवसर पैदा हों। इससे एक गंभीर व्‍यापार में व्‍यापक प्रभाव पड़ेगा और इसमें किसी नवाचार के लिए आवश्‍यक दो निहित तत्‍वों– नये मार्ग या अवसरों का दोहन और सही संतुलन रखने के लिए चुनौतियों का सामना करना शामिल हैं। राजनीतिक नेतृत्‍व के व्‍यापक रूप से लोकप्रिय होने की उम्‍मीद है। लेकिन ‘मेक इन इंडिया’ पहल वास्‍तव में आर्थिक विवेक, प्रशासनिक सुधार के न्‍यायसंगत मिश्रण के रूप में देखी जाती है। इस प्रकार यह पहल जनता जनादेश के आह्वान- ‘एक आकांक्षी भारत’ का समर्थन करती है।
  • मध्‍यावधि की तुलना में विनिर्माण क्षेत्र में 12-14 प्रतिशत प्रतिवर्ष वृद्धि करने का लक्ष्‍य।
  • देश के सकल घरेलू उत्‍पाद में विनिर्माण की हिस्‍सेदारी 2022 तक बढ़ाकर 16 से 25 प्रतिशत करना।विनिर्माण क्षेत्र में 2022 तक 100 मिलियन अतिरिक्‍त रोजगार सृजित करना।
  • ग्रामीण प्रवासियों और शहरी गरीब लोगों में समग्र विकास के लिए समुचित कौशल का निर्माण करना।
  • घरेलू मूल्‍य संवर्द्धन और विनिर्माण में तकनीकी ज्ञान में वृद्धि करना।
  • भारतीय विनिर्माण क्षेत्र की वैश्विक प्रतिस्‍पर्धा में वृद्धि करना।
  • भारतीय विशेष रूप से पर्यावरण के संबंध में विकास की स्थिरता सुनिश्चित करना।
  • भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्‍यवस्‍था के रूप में अपनी हाजिरी दर्ज करा चुका है।यह देश दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्‍यवस्‍थाओं में शामिल होने वाला है और उम्‍मीद की जाती है कि वर्ष 2020 तक यह दुनिया की सबसे बड़ा उत्‍पादक देश बन जाएगा।
  • अगले दो तीन दशकों तक यहां की जनसंख्‍या वृद्धि उद्योगों के अनुकूल रहेगी। जनशक्ति काम करने के लिए बराबर उपलब्‍ध रहेगी।अन्‍य देशों के मुकाबले यहाँ जनशक्ति पर कम लागत आती है।यहां के व्‍यावसायिक घराने उत्‍तरदायित्‍वपूर्ण ढंग से, भरोसेमंद तरीकों से और व्‍यावसायिक रूप से काम करते हैं।घरेलू मार्किट में यहां तगड़ा उपभोक्‍तावाद चल रहा है।
  • इस देश में तकनीकी और इंजीनियरिंग क्षमताएं मौजूद है और उनके पीछे वैज्ञानिक और तकनीकी संस्‍थानों का हाथ है। विदेशी निवेशकों के लिए बाजार खुला हुआ है और यह काफी अच्‍छी तरह से विनियमित है।

जनशक्ति प्रशिक्षण

कोई भी उत्‍पादन क्षेत्र बिना कुशल जनशक्ति के सफल नहीं हो सकता। इसी सिलसिले में यह संतोषजनक बात है कि सरकार ने कौशल विकास के लिए नये उपाय किये हैं। इनमें से निश्‍चय ही गांवों से रोजगार की तलाश में शहरों की ओर पलायन रुकेगा और शहरी गरीबों का अधिक समावेशी विकास हो सकेगा। यह उत्‍पादन क्षेत्र को मजबूत बनाने की दिशा में एक महत्‍वपूर्ण कदम होगा।

नये मंत्रालय 
  • कौशल विकास और उद्यमियता ने राष्‍ट्रीय कौशल विकास पर राष्‍ट्रीय नीति में संशोधन शुरू कर दिया है। ये ध्‍यान देने की बात है कि मोदी सरकार ने ग्राम विकास मंत्रालय के तहत एक नया कार्यक्रम शुरू कर दिया है। इस कार्यक्रम का नाम बीजेपी के नायक पंडित दीनदयाल उपाध्‍याय के नाम पर रखा गया है। नये प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत देशभर में 1500 से 2000 तक प्रशिक्षण केन्‍द्र खोले जाने का कार्यक्रम है। इस सारी परियोजना पर 2000 करोड़ रुपये खर्च आने का अनुमान है। यहाँ सार्वजनिक-निजी भागीदारी प्रारूप में संचालित की जाएगी।
  • नये प्रशिक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत युवा वर्ग को उन कौशलों में प्रशिक्षित किया जाएगा, जिनकी विदेशों में मांग है। जिन देशों को नजर में रखकर यह कार्यक्रम बनाया गया है, उनमें स्‍पेन, अमेरिका, जापान, रूस, फ्रांस, चीन, ब्रिटेन और पश्चिम एशिया शामिल हैं। सरकार ने हर साल लगभग तीन लाख लोगों को प्रशिक्षित करने का प्रस्‍ताव किया है और इस प्रकार से वर्ष 2017 के आखिर तक 10 लाख ग्रामीण युवाओं को लाभान्वित करने का कार्यक्रम बनाया गया है।
  • अन्‍य जो उपाय किये जाने हैं उनमें मूल सुविधाओं और खासतौर से सड़कों और बिजली का विकास करना शामिल है। लंबे समय तक बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां और सॉफ्टवेयर कंपनियां भारत में इसलिये काम करना पसंद करती थी, क्‍योंकि यहां एक विस्‍तृत मार्किट और नागरिकों की खरीद क्षमता है। इसके अलावा इस देश में उत्‍पादन सुविधायें भी मौजूद हैं। इस संदर्भ में यह भी ध्‍यान देने योग्‍य बात है कि यहाँ पर सशक्‍त राजनीतिक इच्‍छा शक्ति, नौकरशाहों और उद्यमियों का अनुकूल रवैया, कुशल जनशक्ति और मित्रतापूर्ण निवेश नीतियां मौजूद हैं।
  • इसी संदर्भ में सरकार की दिल्‍ली और मुम्‍बई के बीच एक औद्योगिक गलियारा विकसित करने की कोशिशों की जा रहीं हैं। सरकार बहुपक्षीय नीतियों पर काम कर रही है। इनमें मुख्‍य संयंत्रों और मूल सुविधाओं के विकास में सम्‍पर्क स्‍थापित करने और पानी की सप्‍लाई सुनिश्चित करने, उच्‍च क्षमता की परिवहन सुविधा विकसित करने का काम शामिल है। इन क्षेत्रों में काम करते हुए सरकार ने पांच सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों को पुनर्जीवित करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। सार्वजनिक क्षेत्र के 11 निगम ऐसे हैं, जिनके बारे में सरकार का विचार है कि छः निगमों को बंद कर दिये जाने की जरूरत है। 1000 करोड़ रूपये की लागत पर इन निगमों के कर्मचारियों के लिए स्‍वैच्छिक सेवानिव़ृत्ति योजना लाई जा रही है। यह एक बारगी समझौता होगा। सरकार द्वारा संचालित जिन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को फिर से काम लायक बनाने का फैसला किया गया है। उनमें एचएमटी मशीन टूल्‍स लिमिटेड, हैवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन, नेपा लिमिटेड, नगालैंड पेपर एंड पल्‍प कंपनी लिमिटेड और त्रिवेणी स्‍ट्रेक्‍चरल्स शामिल हैं।

प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना


फसल बीमा योजना की कमियाँ दूर की गयी हैं और प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना नामक नयी योजना देश भर में फसल बीमा लागू करने को मंजूरी प्रदान की गयी है।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना खरीफ 2016 से देश भर में लागू करने को मंजूरी प्रदान की गयी है।
  • प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत वर्ष 2016-17 के बजट में 5500 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है, जो पिछले वर्ष में 3185 करोड़ रुपये था। इस योजना में लगभग 73 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। फसल बीमा क्षेत्र में यह केंद्र सरकार की ओर से अब तक की सबसे बड़ी वित्‍तीय सहायता है।
  • फसल बीमा प्राप्‍त करने के लिए किसानों को अब तक सबसे न्‍यूनतम प्रीमियम भरना होगा।
  • शेष प्रीमियम के बोझ का वहन सरकार द्वारा किया जाएगा-भले ही वह कुल प्रीमियम के 90 प्रतिशत से अधिक हो।
  • किसान के लिए समस्‍त प्रकार के खाद्यान्‍नों, दालों और तिलहनों की एक सीजन-एक दर होगी।अलग-अलग जिलों के लिए अलग-अलग फसलों की अलग-अलग दरें समाप्‍त कर दी गयी हैं। किसानों द्वारा खरीफ के लिए अधिकतम 2 प्रतिशत और रबी के लिए अधिकतम 1.5 प्रतिशत प्रीमियम का भुगतान किया जाएगा।
  • किसानों को पूर्ण वित्‍तीय सुरक्षा मिलेगी प्रीमियम दरों पर कोई सीमा नहीं होगी और बीमा राशि में कोई कटौती नहीं होगी।
  • खराब मौसम की वजह से किसानों द्वारा बुआईई/रोपाई न किए जाने की स्थिति में, वह मुआवजा प्राप्‍त करने का हकदार होगा।
  • देश भर में पहली बार, कटाई के बाद तूफान, बिना मौसम की बरसात और ओलावृष्टि, भूस्‍खलन और जलभराव जैसी स्‍थानीय आपदाओं के कारण 14 दिन के भीतर होने वाले नुकसान कवरेज में शामिल किया गया है।
  • पहली बार सही प्राक्‍कलन और किसानों को मुआवजों का त्‍वरित भुगतान करने में मोबाइल और उपग्रह तकनीक का उपयोग किया जाएगा।
  • इस योजना के अंतर्गत मीडिया के माध्‍यम से जनता के बीच जागरूकता फैलाने और प्रचार के प्रावधान किए गए हैं, ताकि बीमित किसानों का प्रतिशत अगले 2-3 वर्षों में मौजूदा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जा सके।

आपदा की स्थिति में राहत पहुंचाने के लिए नियमों में बदलाव किए गए हैं -
  • आपदा की स्थिति में मुसीबतों से घिरे किसानों को राहत पहुंचाने के लिए, मोदी सरकार ने राहत मुहैया कराने हेतु नियमों में संशोधन किया है।पहले, राहत केवल तभी मुहैया करायी जाती थी, जब आपदा के कारण फसलों को 50 प्रतिशत या उससे अधिक नुकसान पहुंचता था। अब यह राहत फसलों के 33 प्रतिशत नुकसान होने पर भी पहुंचायी जाती है। विभिन्‍न मदों में मुआवजे की राशि बढ़ाकर 50 प्रतिशत तक कर दी गयी है।
  • एक ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है, जिसके द्वारा अत्‍यधिक बारिश के कारण नष्‍ट होने वाले खाद्यान्‍नों के लिए पूर्ण न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य का भुगतान किया जाएगा। पुराने नियमों के अनुसार, जहां दिवंगत व्‍यक्तियों के परिजनों को मात्र 1.50 लाख रुपये का मुआवजा प्रदान किया जाता था, वहीं सरकार ने इस राशि को बढ़ाकर 4 लाख रुपये कर दिया है।
  • वर्ष 2010- 2015 तक, चार वर्ष की अवधि के लिए राज्‍य आपदा राहत कोष के लिए 33580.93 करोड़ रुपये की राशि का प्रावधान किया गया था। वर्ष 2015- 2020 की अवधि के लिए इस राशि को बढ़ाकर 61219 करोड़ रुपये कर दिया गया है।
  • इसी तरह, चार वर्षों – 2010-11, 2011-12, 2012-13 और 2014-15 के दौरान यूपीए सरकार ने केवल 12516.20 करोड़ रुपये की राहत को मंजूरी दी, जबकि सूखे और ओलावृष्टि से प्रभावित राज्‍यों ने 92043.49 करोड़ रुपये की राहत प्रदान करने की मांग रखी थी। सरकार ने अकेले वर्ष 2014-15 में ही सूखे और ओलावृष्टि से प्रभावित राज्‍यों को राहत पहुंचाने के लिए 9017.998 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की, जबकि इन प्रभावित राज्‍यों ने 42021.71 करोड़ रुपये राशि प्रदान करने की मांग की थी। वर्ष 2015-16 के दौरान, 41722.42 करोड़ रुपये की मांग के विपरीत अब तक 13,497.71 करोड़ रुपये की राशि पहले ही मंजूर की जा चुकी है।
  • एन.डी.आर.एफ. के अंतर्गत, संघशासित प्रदेशों को राहत मुहैया कराने के लिए कोई भी पृथक योजना नहीं थी। इसी को ध्‍यान में रखते हुए, सरकार ने वर्ष 2015-16 के दौरान संघशासित प्रदेशों के लिए 50 करोड़ रुपये की राशि का आवंटन किया है।

प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (पी.एम.के.एस.वाई.)

  • पी.एम.के.एस.वाई. का प्रारंभ सूखे के प्रभाव को कम करने का दीर्घकालिक समाधान विकसित करने के उद्देश्य से किया गया है। पी.एम.के.एस.वाई. न केवल सिंचाई के स्रोत तैयार करने पर ध्‍यान केंद्रित करती है, अपितु यह सूखे के प्रभावों को कम करने और भू-जल में सुधार लाने में सहायता करती है। यह कार्यक्रम तीन मंत्रालयों द्वारा संयुक्त रूप से कार्यान्वित किया जा रहा है।
  • यह योजना मिशन के रूप में कार्यान्वित की जाएगी। इसके तहत 28.5 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में सिंचाई की सुविधा उपलब्‍ध करायी जाएगी, जिसके लिए वर्ष 2016-2017 के लिए 5717 करोड़ रुपये की राशि निर्धारित की गयी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने वर्ष 2015-2016 के 1550 करोड़ रुपये की तुलना में 2340 करोड़ रुपये की राशि प्राप्त की है और यह वृद्धि 51 प्रतिशत की है। यह राशि सूक्ष्‍म सिंचाई (ड्रिप और स्प्रिंकलर), ड्राउट प्रूफिंग और जल संरक्षण गतिविधियों में उपयोग में लायी जाएगी।
  • वर्ष 2013-14 और वर्ष 2014-15 के दौरान क्रमश 4.31 लाख हेक्टेयर और 4.25 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाया गया था।
  • वर्ष 2015-16 के दौरान 5.43 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाया गया। वर्ष 2016-17 के लिए, 7 लाख हेक्टेयर क्षेत्र सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।
  • 89 विशाल और मझौली सिंचाई परियोजनाएं 15-20 वर्षों से लंबित पड़ी हैं। 80.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की सिंचाई के लिए इन परियोजनाओं को पूरा करने के वास्‍ते अगले पांच वर्षों में 86,500 करोड़ रुपए की राशि की आवश्‍यकता होगी।
  • वर्ष 2016-17 के दौरान 23 सिंचाई योजनाओं को लागू करने के लिए 12517 करोड़ रुपये की राशि व्‍यय की जाएगी।
  • इसके अतिरिक्‍त, सिंचाई और त्‍वरित कार्यान्वयन के लिए इस वर्ष नाबार्ड के माध्यम से 20,000 करोड़ रुपये की राशि का कोष तैयार करने का फैसला किया गया है।
  • यह कार्यक्रम हर किसान और हर खेत को सिंचाई का पानी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से शुरू किया गया है।
  • योजना प्रक्रिया में एकरूपता लाने के लिए डीआईपी का खाका विकसित किया गया है और उसे राज्यों के साथ साझा किया गया है।
  • 31 मार्च, 2016 तक 235 डीआईपी तैयार किया गया है और 30 सितंबर 2016 तक, जिलों शेष के लिए डीआईपी तैयार हो जाने की संभावना है।
  • वर्ष 2015-16 के दौरान राज्यों / संघ राज्य क्षेत्रों को डीआईपी तैयार करने के लिए 65.4 करोड़ रुपये की राशि जारी की गई है ।
  • स्‍थैतिक विशेषताओं के साथ पी.एम.के.एस.वाई. की वेबसाइट का शुभारंभ किया गया है।
  • देश में भूजल की समस्या से निपटने के लिए कृषि, सहकारिता और किसान कल्याण विभाग ने वर्ष 2015-16 के दौरान, 175 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की है। उक्‍त राशि का उपयोग केंद्रीय भूजल बोर्ड द्वारा की चिन्हित 150 प्रखंडों में मनरेगा के अंतर्गत पानी से संबंधित कार्यों में सामग्री की पूरक व्‍यवस्‍था के लिए किया जाएगा। यह पहल देश में पहली बार की गयी है।
  • राज्यों को भूजल पुनर्भरण, भूजल की स्थिति में सुधार, मिट्टी में निहित नमी में सुधार साथ ही साथ सूक्ष्म जल भंडारण स्थिति के लिए 258.9 करोड़ रुपए की राशि जारी की गयी है ताकि देश में सूखा प्रभावित 219 जिलों में समस्याओं से निपटा जा सके।
  • ए.टी.एम.ए. कार्यक्रम के माध्‍यम से प्रशिक्षण के लिए 56.2 करोड़ रुपए की राशि का आवंटन किया गया है, ताकि क्षेत्रीय आधार पर किसानों के लिए पानी का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित किया जा सके।

मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना किसानों को उनकी मिट्टी की उर्वरता की स्थिति के बारे में जानकारी प्रदान करने के लिए सरकार द्वारा पहली बार उठाया गया कदम है। इससे पहले कुछ राज्‍य अपने स्तर पर अलग अलग तरीकों से इस योजना को लागू कर रहे थे। मृदा स्वास्थ्य कार्ड्स के माध्यम से नमूना संग्रह, परीक्षण और उर्वरक की सिफारिश में कोई एकरूपता नहीं थी। इससे पहले राज्यों को अलग से धनराशि भी प्रदान नहीं की गयी थी।
  • इस योजना के अंतर्गत, देश के सभी किसानों को दो साल के अंतराल पर मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया जाएगा। यह फसलों की पैदावार के लिए उपयोग में लाए जाने वाले पोषक तत्वों की खुराक संबंधी उचित सिफारिश करेगा और किसानों को उनकी मिट्टी का स्वास्थ्य और उसकी ऊर्वरता में सुधार लाने में सक्षम बनाएगा।
  • इस योजना के अंतर्गत वर्ष 2015-2016 में आवंटित 142 करोड़ रुपये की राशि की तुलना में वर्ष 2016-17 में 155 प्रतिशत वृद्धि के साथ 360 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की गयी है। वर्ष 2015-2016 में संग्रह किए गए 1 करोड़ मिट्टी के नमूनों की तुलना में, 91लाख के नमूने एकत्र किए गए हैं, जिनमें से 4.5 करोड़ कार्ड तैयार किए जाएंगे और किसानों को वितरित किए जाएंगे।

मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन योजना

  • मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन योजना (एस.एच.एम.) पौधों के पोषक तत्‍वों से संबंधित जैविक और अजैव स्रोतों के संयुक्त उपयोग के माध्यम से मृदा परीक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना/सुदृढ़ीकरण, प्रशिक्षण और उर्वरकों के संतुलित उपयोग के प्रदर्शनों के जरिए मृदा परीक्षण पर आधारित संतुलित एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए लागू की जा रही है। पिछले 2 वर्षों के दौरान, 180 (वर्ष 2014-2015 में 79 और वर्ष 2015-2016 में 101) मृदा परीक्षण प्रयोगशालाएं मंजूर की गयीं।

परम्‍परागत कृषि विकास योजना
  • जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए, पहली बार, सरकार द्वारा परम्‍परागत कृषि विकास योजना का शुभारंभ किया गया है। केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 2016-2017, के दौरान 297 करोड़ रुपये आवंटित किए गए, जिसमें वर्ष 2015-2016 में किए गए 250 करोड़ रुपये के आवंटन में 19 प्रतिशत वृद्धि की गई है। अब तक, राज्य सरकारें 8000 समूह बना चुकी हैं।
  • पूर्वोत्तर राज्यों के लिए जैविक मूल्य श्रृंखला पूर्वोत्तर राज्यों और जैविक मूल्य श्रृंखला के विकास हेतु आगामी तीन वर्षों के लिए वर्ष 2015-2016 में 400 करोड़ रूपये की राशि आवंटित की गई। यह योजना वर्ष 2015-2016 में 125 करोड़ रुपये के आवंटन से साथ प्रारंभ की गयी, जो जैविक कृषि योजना के विकास के लिए मार्ग प्रशस्त करेगी। शेष 275 करोड़ रुपये की धनराशि अगले वर्ष (2016-17 और 2017-18) संचालित की जाने वाली परियोजनाओं की जरूरतों को पूरा करेगी। इसके अलावा मनरेगा के अंतर्गत जैविक खाद के लिए 10 लाख वनस्‍पतिक खाद की खाइयों तैयार की जाएगी।

नीम कोटेड यूरिया
  • मोदी सरकार ने नीम कोटेड यूरिया के उत्‍पादन को 100 प्रतिशत अनिवार्य बना दिया है। सभी आयातित यूरिया पर भी नीम का कोट लगाया जाना आवश्यक है। नीम कोटेड यूरिया का उपयोग करने से, सादे यूरिया की तुलना में 10-15 प्रतिशत बचत होने का अनुमान है।

राष्‍ट्रीय कृषि मंडी

  • किसानों को उनकी उपज के अच्छे दाम मिल सके, इसके लिए भारत सरकार ने 1 जुलाई 2015 को 200 करोड़ रुपये के साथ राष्ट्रीय कृषि मंडी योजना का प्रारंभ किया। इसका उद्देश्य मार्च 2018 तक 585 नियंत्रित मंडियों को सामान्य ई-मार्केट प्‍लेटफॉर्म के साथ जोड़ना है।
  • 12 राज्यों / संघ शासित प्रदेशों यथा-गुजरात, महाराष्ट्र, तेलंगाना, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, चंडीगढ़ (संघ शासित प्रदेश), उत्तर प्रदेश, हरियाणा, आंध्र प्रदेश और हिमाचल प्रदेश की 365 मंडियों को राष्ट्रीय कृषि मंडी (एन.ए.एम.) के सा‍थ जोड़ने के लिए और रणनीतिक साझीदार द्वारा एन.ए.एम. प्‍लेटफॉर्म के कार्यान्वयन के लिए 30 अप्रैल 2016 तक,159.43 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की गई थी।
  • माननीय प्रधानमंत्री द्वारा 14 अप्रैल, 2016 को डॉ. भीम राव अम्बेडकर की 100 वीं जयंती के अवसर पर इस योजना के अंतर्गत ई-ट्रेडिंग प्‍लेटफॉर्म (ई- एन.ए.एम.) को संचालित किया गया है।
  • अप्रैल 2016-सितंबर 2016 के बीच, 200 मंडियों को इस ई-ट्रेडिंग पोर्टल के साथ जोड़ा जाएगा।
  • 31 मार्च 2017 तक, 200 मंडियों के अगले बैच के इस ई-ट्रेडिंग पोर्टल के साथ जोड़ा जाएगा।
  • शेष 185 मंडियों को 31 मार्च 2018 तक इस ई-ट्रेडिंग पोर्टल के साथ जोड़ा जाएगा।

कृषि के क्षेत्र में वित्तीय प्रवाह
  • कृषि क्षेत्र में वित्तीय प्रवाह वर्ष 2015-16 के 8.5 लाख करोड़ रुपये से बढ़ा कर वर्ष 2016-17 में 9 लाख रुपये कर दिया गया है, ताकि ऋण तक पहुंच बढ़ायी जा सके।

कृषि शिक्षा और अनुसंधान
  • पूर्वोत्तर भारत की अपार संभावनाओं को पहचानते हुए सरकार द्वारा केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय इम्फाल के अंतर्गत छह नए महाविद्यालय, खोले गए। इसके कारण, पूर्वोत्तर क्षेत्र में कृषि महाविद्यालयों की संख्या में पिछले दो साल में लगभग 85 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
  • इसी तरह, बुंदेलखंड क्षेत्र में, रानी लक्ष्मीबाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, झांसी के अंतर्गत 4 नए महाविद्यालय खोले गए।
  • पूसा अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, की तर्ज पर 68 वर्षों में पहली बार, भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (आई.ए.आर.आई.) बरही, झारखंड में स्थापित किया गया और अब एक और संस्‍थान असम में स्थापित किया जा रहा है। सरकार ने विभिन्न राज्यों में उच्च कृषि शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए, आठ नए कृषि विश्वविद्यालयों की स्थापना में सहायता प्रदान की है। नई सरकार के प्रयासों के फलस्‍वरूप, वर्ष 2013 की तुलना में वर्ष 2015 में राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में आई.सी.ए.आर. के माध्यम से छात्रों की भर्ती में लगभग 41 प्रतिशत वृद्धि हुई।
  • ग्रामीण कृषि कार्य अनुभव (आर.ए.डब्‍ल्‍यू.ई.) का लक्ष्‍य किसानों के साथ काम करने का वास्‍तविक अनुभव प्रदान कराना, उत्पादन, संरक्षण और विपणन संबंधी अवरोधों की पहचान कराना, औद्योगिक सम्‍बद्धता, व्‍यवहारिक प्रशिक्षण आदि उपलब्‍ध कराना है। वर्ष 2016 से छात्रों के लिए छात्रवृत्ति 750 रुपये प्रति माह से बढ़कर 3000 रुपये प्रति माह कर दी गई है ।
  • राष्ट्रीय प्रतिभा छात्रवृत्ति (एन.टी.एस.) के अंतर्गत स्नातक की पढ़ाई करने वाले छात्रों को वित्तीय सहायता 1000 रुपये प्रतिमाह से बढ़ाकर 2000 रुपये प्रति माह कर दी गई है और वर्ष 2016 से अन्य राज्य में पढ़ने जाने वाले स्नातकोत्तर छात्रों के लिए 3000 रुपये प्रतिमाह छात्रवृत्ति की एक नई पहल की गयी है।
  • कृषि महाविद्यालयों में अनुभवजन्य शिक्षण इकाइयों की संख्या में वर्ष 2013 की तुलना में लगभग 50 प्रतिशत वृद्धि हुई है।
  • दक्षता बढ़ाने और खेती की कुल लागत में कमी लाने के लिए नए कृषि उपकरणों के कुल 9067 प्रोटोटाइप विकसित किए गए। वर्ष 2013 की तुलना के रूप में, इनकी संख्या लगभग दोगुनी हो गई है।
  • पूर्वी भारत में दूसरी हरित क्रांति की गति में तेजी लाने के लिए, "राष्ट्रीय समेकित कृषि अनुसंधान केन्द्र" जैसे दूसरे केंद्र की मोतिहारी, बिहार में स्थापना की जा रही है।
  • गंगटोक, सिक्किम में प्रथम राष्ट्रीय जैव कृषि अनुसंधान संस्थान स्थापित करने का निर्णय किया गया है।
  • सूखा, बाढ़, कोहरा, तूफान, आदि जैसी प्राकृतिक आपदाओं से किसानों की आजीविका को बचाने और इनका प्रभाव कम करने के लिए 79 नई आकस्मिक योजना विकसित की गई हैं और उन्‍हें 600 प्रभावित जिलों में लागू किया गया है।
  • त्‍वरित गति से मृदा परीक्षण करने और संतुलित उर्वरकों की सिफारिश करने के लिए नव मृदा परीक्षक किट विकसित की गई है।

वैज्ञानिकों की भर्ती में वृद्धि - 
  • खुली प्रतियोगिता और महिला वैज्ञानिकों के प्रतिनिधित्व में वृद्धि के माध्यम से भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाते हुए वर्ष 2013-14 में हुई मात्र 66 प्रतिशत भर्तियों की तुलना में वर्ष 2014-15 और 2015-16 में 81 प्रतिशत भर्तियां की गईं।
  • वर्ष 2015-16 में डी.ए.आर.ई./आई.सी.ए.आर. को कुल 5387.95 करोड़ रुपये के वित्तीय संसाधन उपलब्‍ध कराये गये, जबकि वर्ष 2016-17 में पिछले साल की तुलना में लगभग 17 प्रतिशत की वृद्धि के साथ 6309.89 करोड़ रुपए के वित्तीय संसाधन उपलब्‍ध कराये गये हैं, जिससे शिक्षा, अनुसंधान और कृषि विस्तार को बल मिलेगा।
  • दालों, तिलहनों और अन्‍य फसलों की उन्‍नत किस्‍मों पर ध्‍यान केंद्रित किया गया।
  • पिछले दो वर्षों के दौरान अनाज, तिलहन, दालों, फाइबर और चारा फसलों सहित विभिन्न फसलों की 155 नई उन्नत किस्में विकसित की गई हैं।
  • पिछले दो वर्षों के दौरान रोग प्रतिरोधक क्षमता से युक्‍त दालों की 20 और तिलहनों की 24 नई अधिक उपज देने वाली किस्में विकसित की गई हैं।
  • तिलहनों की इन किस्मों में अधिक उपज के अलावा, तेल की मात्रा भी अधिक है।
  • चावल और गेहूं सहित अनाज की 96, फाइबर फसलों की तीन, चारा फसलों की नौ और गन्ने की तीन किस्में विकसित की गई हैं।
  • एक नई किस्म 'पूसा मस्‍टर्ड 30' और उसका तेल 4 फरवरी 2016 व्यावसायिक रूप से लान्‍च किया गया। इसमें स्वास्थ्य के लिए हानिकारक इरुसिक एसिड की बहुत कम मात्रा है।
  • 'खेसारी दाल' की तीन नई किस्में विकसित की गई हैं। इनमें हानिकारक रसायन ओएडीपी नगण्य मात्रा में है। नई और सुरक्षित खेसारी दाल की किस्मों की खेती शुरू करने के लिए पहल की गई है।

पशुपालन, डेयरी और पशु चिकित्‍सा शिक्षा
  • राष्‍ट्रीय गोकुल मिशन, राष्ट्रीय पशु प्रजनन एवं डेयरी विकास कार्यक्रम के अंतर्गत एक नई पहल है और इसे देशी, गोजातीय नस्‍लों के संरक्षण और विकास के लिए देशभर में पहली बार शुरू किया गया है।
  • देशी नस्लों के विकास के लिए वर्ष 2007-08 से वर्ष 2013-14 तक, केवल 45 करोड़ रुपये की अल्प राशि ही खर्च की गई थी, जबकि वर्तमान सरकार ने दिसंबर 2015 तक, केवल डेढ़ वर्ष की अवधि में ही 27 राज्यों की 29 परियोजनाओं को मंजूरी प्रदान की और 550 करोड़ रुपये की राशि मंजूर की।50 करोड़ रुपये के आवंटन के साथ देश में दो राष्ट्रीय कामधेनु प्रजनन केंद्र- एक उत्तरी क्षेत्र में और एक दक्षिणी क्षेत्र में स्थापित किये जा रहे हैं।
  • दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में भारत विश्व में पहले नम्‍बर पर है। दूध उत्पादन वर्ष 2013-14 के 137,61 मिलियन टन से बढ़कर वर्ष 2014-15 के दौरान 146,31 मिलियन टन हो गया और इसमें 160 मिलियन टन वृद्धि (अनुमानित) है पिछले 10 वर्षों के दौरान, दुनिया के औसत दुग्‍ध उत्पादन में सालाना 2.2प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जबकि भारत में दुग्‍ध उत्पादन में सालाना 4.2 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2014-15 और 2015-16 के दौरान देश में दुग्‍ध उत्पादन में क्रमश 6.3 प्रतिशत और 9 प्रतिशत (अनुमानित) वृद्धि हुई।
  • प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों की कमी को पूरा करने के लिए, पशु चिकित्सा महाविद्यालयों की संख्या 36 से बढ़ाकर 46 कर दी गई है। विभिन्न पशु चिकित्सा महाविद्यालयों में छात्रों की सीटों की संख्‍या 60 से बढ़ाकर 100 कर दी गई है। 17 पशु चिकित्सा महाविद्यालयों में सीटों की कुल संख्‍या 914 से बढ़ाकर 1332 कर दी गई है। पशु चिकित्‍सा स्‍नातकों की संख्‍या में डेढ़ गुना वृद्धि हुई है। इसी प्रकार पशु चिकित्‍सा महाविद्यालयों में सीटों की संख्‍या में डेढ़ गुना वृद्धि हुई है। पशु चिकित्‍सा शिक्षा में स्‍नातकोत्‍तर अध्‍ययन में डेढ़ गुना वृद्धि प्राप्‍त कर ली गई है। पशु चिकित्‍सा महाविद्यालयो में सीटों की संख्‍या में डेढ़ गुना वृद्धि हुई।
  • चार नई परियोजनाएं – मवेशी संजीवनी, नकुल स्‍वास्‍थ्‍य पत्र, ई-मवेशी हॉट और राष्‍ट्रीय देशी नस्‍ल जिनोमिक केंद्र के लिए नये बजट में 850 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।
  • पशुपालन, डायरी और मत्स्य पालन के लिए वर्ष 2016-17 के लिए 1600 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है, जबकि वर्ष 2015-16 में यह राशि 1491 करोड़ रूपये थी।
  • वर्ष 2014-15 के दौरान देश में 78,484 मिलियन अंडों का उत्‍पादन हुआ, जबकि वर्ष 2013-14 के दौरान 74752 करोड़ अंडों का उत्पादन हुआ था। देश में अंडों के उत्पादन में अब सालाना 5 प्रतिशत वृद्धि हो रही है।

नीली क्रांति
  • मत्स्य पालन के क्षेत्र में विकास की अपार संभावनाओं को देखते हुए मोदी सरकार इस क्षेत्र में 'नीली क्रांति' की शुरुआत की है। तदनुसार, सभी जारी योजनाओं का विलय करते हुए 'नीली क्रांति' नामक योजना तैयार की गई है।
  • 'नीली क्रांति' योजना के अंतर्गत अंतर्देशीय और समुद्री मत्स्य पालन को जोड़ते हुए पूरे मत्स्य पालन क्षेत्र के समेकित विकास को सुगम बनाया गया है। 'नीली क्रांति' में उन्नत प्रौद्योगिकियों के जरिये मछली पालन और देश में उपलब्‍ध के उपयोग विशाल मत्स्य संसाधनों का उपयोग करते हुए मछली उत्पादन बढ़ाने पर मुख्य रूप से ध्‍यान केंद्रित किया गया है।
  • केंद्रीय बजट में 'नीली क्रांति' योजना हेतु पांच साल के लिए 3000 करोड़ रुपये निर्धारित किए गए हैं।वर्ष 2014-15 के दौरान 101.64 लाख टन मछली का उत्पादन हुआ, जबकि वर्ष 2013-14 के दौरान 95.72 लाख टन मछली का उत्‍पादन हुआ था। (इसमें 5.92 लाख टन की वृद्धि दर्ज की गई)वर्ष 2015-16 के दौरान मछली उत्पादन बढ़कर 107.95 लाख टन हुआ (6.31 लाख टन की वृद्धि), जो वर्ष 2014-15 से 6.21 प्रतिशत अधिक है।
  • वर्ष 2013-14 के दौरान पिछली सरकार द्वारा 'बचत-सह-राहत' घटक के अंतर्गत प्रति माह प्रदान की जाने वाली 600 रुपये की राशि मोदी सरकार द्वारा बढ़ा दी गई है। वर्ष 2014-15 के दौरान इसे बढ़ाकर 900 रुपये प्रति माह कर दिया गया, और इसे पुन संशोधित करते हुए नीली क्रांति योजना के अंतर्गत 1500 प्रति माह किया गया है।
  • 'नीली क्रांति मत्स्य पालन का समन्वित विकास और प्रबंधन' क्षेत्र के अंतर्गत पूर्वोत्‍तर राज्यों के लिए केंद्रीय वित्तीय सहायता 75 प्रतिशत से बढ़ा कर 80 प्रतिशत तक दी गई है।

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