Saturday, 1 April 2017

भारतीय प्रशासन का संवैधानिक संदर्भ


प्रस्तावना

  • संविधान, किसी देश का उच्चतम कानून होता है। इनमेँ उन मूलभूत सिद्धांत का वर्णन होता है जिन पर किसी देश की सरकार और प्रशासन की प्रणाली टिकी होती है।
  • भारतीय प्रशासन के संवैधानिक संदर्भ का आशय भारतीय प्रशासन के उनके अधिकार और राजनीतिक ढांचों से है, जिनका निर्धारण भारतीय संविधान द्वारा किया गया है। दूसरे शब्दों में, हम कह सकते है कि भारतीय प्रशासन की प्रकृति, संरचना, शक्ति और भूमिका भारतीय संविधान के सिद्धांतों और प्रावधानों  द्वारा निर्धारित एवं प्रभावित है।
  • भारतीय संविधान की रचना कैबिनेट मिशन योजना के तहत वर्ष 1946 मेँ गठित संविधान सभा द्वारा की गई थी। इस संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद थे – डॉ. बी. आर. अंबेडकर उस सात सदस्यीय प्रारुप समिति के अध्यक्ष थे जिसने संविधान का प्रारुप तैयार किया था। संविधान सभा ने संविधान के निर्माण मेँ दो वर्ष, 11 माह और 18 दिन का समय लिया।
  • भारतीय संविधान 26 नवंबर 1949 को अपनाया गया तथा 26 जनवरी 1950 से प्रभावी हुआ। इसी दिन से भारत एक गणतंत्र बन गया।
  • भारतीय संविधान विश्व के लिखित एवं विस्तृत संविधानों मेँ से एक है। मूलतः इस संविधान में 22 अध्याय, 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। वर्तमान में इसमेँ 24 अध्याय, लगभग 450 अनुच्छेद और 12 अनुसूचियाँ शामिल हैँ।
  • संविधान की प्रस्तावना द्वारा भारत को संप्रभुता संपन्न, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष और प्रजातांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है। इसके अतिरिक्त संविधान के उद्देश्यों के रुप में न्याय, स्वतंत्रता समानता और भाईचारे की भावना को प्रमुखता प्रदान की गई है। संविधान की प्रस्तावना में 
  • समाजवादी और पंथ निरपेक्ष शब्दोँ को 42 वेँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के द्वारा जोड़ा गया है।

भारतीय प्रशासन के संवैधानिक संदर्भ के विभिन्न पहलुओं की व्याख्या निम्नलिखित शीर्षकों के तहत की गई है-
1. मौलिक अधिकार
2. राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत
3. मौलिक कर्तव्य
4. संघीय प्रणाली
5. केंद्र और राज्य के बीच विधायी संबंध
6. केंद्र और राज्य के बीच प्रशासनिक संबंध
7. केंद्र राज्य के मध्य वित्तीय संबंध
8. संसदीय प्राणाली
9. संविधान-एक झलक
10. संविधान की अनुसूचियाँ

मौलिक अधिकार Fundamental Rights
  • मौलिक अधिकारों का उल्लेख संविधान के भाग तीन में अनुच्छेद 12 से 35 में है। संविधान निर्माताओं को इस संदर्भ में संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान (बिल ऑफ राइट्स) से प्रेरणा मिली थी।
  • संविधान में भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों की गारंटी दी गई है। इसका आशय 2 चीजो से है- पहला संसद इन अधिकारों  को निरस्त या कम केवल संविधान संशोधन करके ही कर सकती है और यह संशोधन संविधान की धारा 368 में उल्लिखित क्रियाविधि के अनुसार ही किया जा सकता है।
  • इन अधिकारों के संरक्षण का उत्तरदायित्व उच्चतम नन्यायालय पर है। अर्थात मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए पीड़ित व्यक्ति सीधे उत्तम न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकता है।
  • मौलिक अधिकार औचित्यपूर्ण हैं, परंतु निरपेक्ष नहीं। सरकार इन पर न्यायोचित प्रतिबंध लगा सकती है, परंतु इन प्रतिबंधों के औचित्य या अनौचित्य का निर्धारण उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाता है।
  • ये अधिकार राज्य द्वारा अतिक्रमण किए जाने के विरुद्ध नागरिकोँ की स्वतंत्रताओं और अधिकारों की सुरक्षा करते हैं।
  • संविधान के अनुच्छेद 12 के अनुसार राज्य के अंतर्गत भारत सरकार, संसद तथा राज्यों की सरकारें, विधान सभायें तथा भारत के राज्य क्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन सभी स्थानीय और अन्य प्राधिकरण शामिल हैं।
  • सभी न्यायालय किसी भी मौलिक अधिकार का उल्लंघन करने वाले विधायिका के कानूनों और कार्यपालिका के आदेशो को असंवैधानिक और गैर कानूनी घोषित कर सकते हैं (अनुच्छेद 13)।
  • मौलिक अधिकार राजनीतिक प्रजातंत्र के आदर्शोँ को बढ़ावा देने और देश मेँ अधिनायकवादी शासन की प्रवृत्ति को रोकने के लिए हैं।
संविधान मेँ मूलतया 7 मौलिक अधिकारोँ का प्रावधान था। संविधान के 44 वेँ संशोधन अधिनियम 1978 के माध्यम से मौलिक अधिकारोँ की सूची से संपत्ति के अधिकार को हटा दिया गया है। इसलिए अब केवल 6 मौलिक अधिकार हैं यथा –
समता का अधिकार
  • कानून (विधि) के समक्ष समानता अथवा समान कानूनी संरक्षण (अनुच्छेद 14)
  • धर्म, मूल, जाति, लिंग और जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध (अनुच्छेद 15)
  • लोक नियोजन मामलोँ मेँ अवसर की समानता (अनुच्छेद 16)
  • अस्पृश्यता (छुआछूत) का अंत तथा इस प्रकार के किसी भी आचरण पर रोक (अनुच्छेद 17)
  • पदवियों का अंत (सैन्य और शैक्षिक उपाधियों) को छोड़कर (अनुच्छेद 18)
स्वतंत्रता का अधिकार
  • सभी नागरिकोँ को अनुच्छेद 19-
  • वाक् स्वतंत्रता (बोलने की आजादी) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
  • शांतिपूर्ण और निःशस्त्र सम्मेलन की स्वतंत्रता
संगठन या संघ बनाने की स्वतंत्रता
  • भारत के राज्य क्षेत्र मेँ सर्वत्र स्वतंत्र रुप से घूमने फिरने की स्वतंत्रता
  • भारत के राज्य क्षेत्र के किसी भाग मेँ बसने और रहने की स्वतंत्रता
  • कोई व्यवसाय, उपजीविका, व्यापार व कारोबार करने की स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त होगा।
  • अपराधो के लिए दोष सिद्धि के संबंध मेँ संरक्षण (अनुच्छेद 20)
  • जीवन और स्वतंत्रता (व्यक्तिगत) का संरक्षण (अनुच्छेद 21)
  • आरंभिक शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21 क), जिसे 86वें मेँ संविधान संशोधन 2002 द्वारा जोड़ा गया है।
  • कुछ स्थितियों मेँ गिरफ्तारी और नजरबंदी से संरक्षण (अनुच्छेद 22)
शोषण के विरुद्ध अधिकार
  • मानव दुर्व्यापार और बलात श्रम पर प्रतिबंध (अनुच्छेद 23)
  • कारखानो मेँ 14 वर्ष से कम आयु के बालकोँ के नियोजन पर निषेधात्मक प्रतिबंध (अनुच्छेद 24)
धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार
  • अंतकरण और धर्म को मनाने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25)
  • धार्मिक आयोजनोँ की आजादी (अनुच्छेद 26)
  • किसी धर्म विशेष की अभिवृद्धि के लिए करोँ का भुगतान संबंधी स्वतंत्रता (अनुच्छेद 27)
  • शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा प्राप्ति या धार्मिक उपासना की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 28)
सांस्कृतिक और अधिकार
  • भाषा लिपि और संस्कृति के संबंध मेँ अल्पसंख्यक वर्ग के हितों का संरक्षण (अनुच्छेद 29)
  • शिक्षण संस्थान की स्थापना और उन पर प्रशासन करने का अल्पसंख्यक वर्गों का अधिकार (अनुच्छेद 30)
संवैधानिक उपचारोँ का अधिकार
मौलिक अधिकारोँ को लागू करने के लिए उच्चतम न्यायालय का फैसला लेने के अधिकार की गारंटी है।
उच्चतम न्यायालय को मूल अधिकारोँ को लागू करने के लिए निर्देश या आदेश या रिट, जिनमें बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकारी-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट शामिल हैं, जारी करने की शक्ति प्राप्त होगी (अनुच्छेद 32)।

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत
राज्य के नीति निर्देशक सिद्धांतोँ का उल्लेख संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 मेँ किया गया है। यह श्रेष्ठ विचार आयरलैंड के संविधान से प्रेरित है।
देश पर प्रशासन के लिए यह सिद्धांत मौलिक हैं, इसलिए कानून बनाते समय इनके अनुपालन की जिम्मेदारी राज्य की है। ये सिद्धांत मौलिक अधिकारो से निम्नलिखित संदर्भ मेँ अलग हैं-
मौलिक अधिकारोँ का औचित्य सिद्ध किया जा सकता है जबकि निर्देशक सिद्धांतों का औचित्य सिद्ध नहीँ किया जा सकता, इसलिए इन सिद्धांतो के उल्लंघन होने पर न्यायालय द्वारा उन्हें लागू नहीँ करवाया जा सकता।
मौलिक अधिकारोँ का उद्देश्य राज्य की कड़ी कार्यवाही से नागरिकोँ की रक्षा करके उन्हें राजनीतिक आजादी की गारंटी प्रदान करना है, जबकि निदेशक तत्वो का उद्देश्य राज्य द्वारा समुचित कार्यवाही के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक आजादी को सुनिश्चित करना है।
निदेशक (निर्धारण) तत्वों को उनकी उनकी प्रकृति के आधार पर निम्नलिखित तीन श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है-
कल्याणकारी (समाजवादी) सिद्धांत
गांधीवादी सिद्धांत
उत्तरवादी-बौद्धिक सिद्धांत
कल्याणकारी (समाजवादी) सिद्धांत
लोगोँ में कल्याण की भावना को बढ़ावा देने के लिए समाज व्यवस्था को द्वारा बनाए रखेगा- सामाजिक, आर्थिक, एवं राजनीतिक- तथा आय, स्तर, सुविधाओं एवं अवसरोँ मेँ असमानता को न्यूनतम करना (अनुच्छेद 38)।

राज्य अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करेगा कि-
  • सभी नागरिकों के लिए जीविका के पर्याप्त साधनो के अधिकार को सुनिश्चित करना।
  • सर्वसाधारण के हित के लिए समुदाय के भौतिक संसाधनों के समान वितरण को सुनिश्चित करना।
  • उत्पादन के साधनों एवं धन के विकेंद्रीकरण के निवारण हेतु प्रयास करेगा।
  • पुरुषोँ और महिलाओं के लिए लिए समान कार्य के लिए समान वेतन हो।
  • श्रमिकों की शक्ति एवं स्वास्थ्य की सुरक्षा तथा बच्चो की बलात श्रम के विरुद्ध सुरक्षा हो।
  • बच्चो के स्वस्थ विकास हेतु अवसर उपलब्ध हों।
  • समान न्याय को संवर्धित करना और गरीबों को निःशुल्क वैधानिक सहायता उपलब्ध कराना (अनुच्छेद 39 क)।
  • रोजगार और शिक्षा पाने तथा बेरोजगारी, वृद्धावस्था और विकलांगता की स्थिति मेँ सार्वजनिक सहायता पाने का अधिकार हो (अनुच्छेद 41)।
  • कार्य की न्याय संगत और मानवोचित दशाओं के अनुसार प्रसूति सहायता का प्रावधान हो (अनुच्छेद 42)।
  • सभी श्रमिकोँ के लिए मजदूरी जीवन के गरिमामय मानकों एवं सांस्कृतिक अवसरोँ की उपलब्धता हो।
  • उद्योगो के प्रबंधन मेँ मजदूरोँ की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाना (अनुच्छेद 43 क)।
  • आजीविका स्तर और पोषण के स्तर को ऊपर उठाना और जन स्वास्थ्य मेँ सुधार करना (अनुच्छेद 47)।
गांधीवादी सिद्धांत
  • ग्राम पंचायतो का गठन तथा उन्हें आवश्यक शक्तियों व प्राधिकारों से सुस्सजित करना ताकि वे स्वशासन की इकाइयोँ के रुप मेँ कार्य कर सकें (अनुच्छेद 40)।
  • ग्रामीण क्षेत्रोँ मेँ व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योग को बढ़ावा देना (अनुच्छेद 43)।

उद्योग से बड़ी है सेहत की चिंता

सर्वोच्च न्यायालय ने 29 मार्च को जो फैसला सुनाया, वह पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता के पीठ ने ऑटोमोबाइल निर्माताओं को यह निर्देश दिया कि वे आगामी एक अप्रैल से देश भर में भारत स्टेज-3 (बीएस-3) वाहनों की ब्रिकी बंद करें। अदालत ने यह भी कहा कि अगर एक अप्रैल के बाद कोई बीएस-3 गाड़ी रजिस्ट्रेशन के लिए आती है, तो राज्य परिवहन विभाग वह दस्तावेज देखेगा, जिससे यह साबित हो सके कि गाड़ी 31 मार्च, 2017 से पहले खरीदी गई है।
आदेश में दो जजों की इस बेंच ने स्पष्ट तौर पर कहा कि भले ही देश में गाड़ियों के कुल स्टॉक में बीएस-3 गाड़ियों की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है, फिर भी बढ़ रहे वायु प्रदूषण और लोगों के बिगड़ते स्वास्थ्य के मद्देनजर यह कहना गलत नहीं होगा कि जनता का स्वास्थ्य और जीवन के उनके मौलिक अधिकार ऑटोमोबाइल निर्माताओं के व्यावसायिक हितों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हैं।यह एक महत्वपूर्ण निर्देश है। इसमें ऑटोमोबाइल निर्माताओं के लिए न सिर्फ सख्त संदेश है, बल्कि एक सबक भी है कि उन्हें अब अतिरिक्त प्रयास करने ही होंगे। संकीर्ण नजरिया अपनाकर उन्हें इस बदलाव को कमतर नहीं करना चाहिए। वाहन कंपनियों को आम लोगों के स्वास्थ्य को पर्याप्त तवज्जो देनी होगी।
मामले की सुनवाई के दौरान ऑटोमोबाइल निर्माताओं की तरफ से बिना बिकी बीएस-3 गाड़ियों के आंकड़े भी पेश किए गए। यह आंकड़ा बताता है कि देश में फिलहाल 8,24,275 बिना बिके बीएस-3 वाहन हैं। इनमें से 96,724 तो व्यावसायिक गाड़ियां हैं, जबकि 6,71,305 दोपहिया, 16,198 कारें और 40,048 तिपहिया गाड़ियां हैं। कंपनियों की मांग यह थी कि उन्हें अपने इस स्टॉक को खत्म करने के लिए एक वर्ष की मोहलत दी जाए, मगर सुप्रीम कोर्ट ने उनकी तमाम दलीलों को खारिज कर दिया।
इस पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण और पूरी तरह अस्वीकार्य पक्ष यह है कि साल 2010 से ही ऑटोमोबाइल कंपनियां कुछ निर्धारित क्षेत्रों के लिए बीएस-4 वाहनों का उत्पादन कर रही हैं, तब भी उनमें से ज्यादातर ने बीएस-3 गाड़ियों के उत्पादन को कम करने को लेकर संजीदगी नहीं दिखाई। वे पुरानी रफ्तार से ही इन गाड़ियों का उत्पादन करती रहीं, जबकि वे जान रही थीं कि ये गाड़ियां मानव-स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचा रही हैं। इन वर्षों में उनके कारोबारी रवैये में कोई तब्दीली तो नहीं ही आई, उन्होंने इस बदलाव के लिए कोई ठोस रणनीति भी नहीं बनाई। हालांकि ऐसा नहीं है कि सभी ऑटोमोबाइल कंपनियों का बर्ताव एक सा रहा। कुछ ऐसी कंपनियां भी रहीं, जिन्होंने समय पूर्व बीएस-3 गाड़ियों के उत्पादन को रोकने के लिए अपने तईं कोशिशें कीं। ऐसी कंपनियों में मैं निश्चय ही मारुति उद्योग लिमिटेड, टोयोटा, हुंडई, जनरल मोटर्स और दोपहिया गाड़ियां बनाने वाली कंपनी बजाज ऑटो लिमिटेड का नाम लेना चाहूंगी। हालांकि यह सोच पूरे ऑटोमोबाइल उद्योग की और एक साझा कॉरपोरेट सहमति वाली होनी चाहिए थी।
बीएस-3 से बीएस-4 की तरफ बढ़ाया गया यह कदम महत्वपूर्ण इसलिए भी है, क्योंकि इससे हमारी आबोहवा में सूक्ष्म कणों यानी पार्टिकुलेट मैटर का उत्सर्जन काफी कम हो सकता है। अनुमान है कि नए बीएस-4 ट्रकों से 80 फीसदी और कारों से 50 फीसदी तक उत्सर्जन कम हो सकता है। इसी तरह, बीएस-4 दोपहिया वाहन 41-80 फीसदी तक हाइड्रोकार्बन और नाइट्रोजन ऑक्साइड का कम उत्सर्जन कर सकते हैं; हालांकि यह काफी कुछ इंजन पर निर्भर करेगा।
एक मसला और महत्वपूर्ण है। अगले 15-20 वर्षों तक बीएस-3 गाड़ियां भारतीय सड़कों पर दौड़ती रहेंगी। लिहाजा हमें यह गंभीरता से सोचना चाहिए कि दिल्ली-एनसीआर ही नहीं, बल्कि पूरा भारत इस मानक के नरम प्रावधानों और पुरानी बीएस-3 गाड़ियों की वजह से जहरीले प्रदूषण को न झेलता रहे। हकीकत यह है कि वायु प्रदूषण दिल्ली-एनसीआर के साथ-साथ पूरे देश के लिए एक बड़ा खतरा बन चुका है। ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज की 2017 की रिपोर्ट बताती है कि पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर 2.5) की वजह से दुनिया भर में होने वाली मौतों में भारत का स्थान दूसरा है। इतना ही नहीं, ओजोन प्रदूषण भी हमारी जान ले रहा है और इस मामले में हम दुनिया भर में शीर्ष पर हैं। आलम यह है कि वायु प्रदूषण से होने वाली कुल वैश्विक मौतों में से एक-चौथाई से अधिक भारत में हो रही हैं। जाहिर है, हम इन तमाम आंकड़ों को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
अच्छी बात यह है कि बीएस-4 वाहनों के मद्देनजर तेलशोधन क्षेत्र (रिफाइनरी सेक्टर) ने पहले से ही तेलशोधन तकनीक और उसके उन्नयन के लिए कई तरह के प्रयास शुरू कर दिए हैं। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकडे़ बताते हैं कि भारत में एक साल में करीब दो करोड़ गाड़ियों का रजिस्ट्रेशन होता है और कल से सिर्फ बीएस-4 गाड़ियां ही बिकेंगी, तो माना जा सकता है कि अदालत का यह फैसला जन-स्वास्थ्य की दिशा में कितना बड़ा कदम साबित हो सकता है।
हालांकि यहां इस चिंता को भी खारिज नहीं किया जा सकता कि जब पूरी दुनिया यूरो-7 की ओर बढ़ रही है, तो हम बीएस-4 ही अपना रहे हैं, यानी हम यूरोपीय देशों से इस मामले में नौ साल पीछे हैं। मगर इसकी वजह हमारा अपना ढीलापन है। साल 2003 में ही ऑटो ईंधन नीति से संबंधित पहली सिफारिशें आ गई थीं। इसमें 2010 तक का रोडमैप था। मगर त्वरित प्रतिक्रिया दिखाने की बजाय हम लापरवाह बने रहे। दूसरी सिफारिशें 2015 में आईं, मगर इनमें भी जिन प्रावधानों की चर्चा थी, वे काफी नरम मानी गईं। लिहाजा हमने और हमारी संस्था ने इस मसले में हस्तक्षेप करके यह सुनिश्चित कराने की कोशिश की कि देश के आम लोगों के स्वास्थ्य हित हमारे नीति-नियंताओं की सुस्त चाल की बेदी पर न चढ़ पाएं। हमारी यही मांग थी कि भारत तेज गति से आगे बढ़े और दुनिया के दूसरे देशों के मापदंडों के समकक्ष पहुंचे। यह बताते हुए अच्छा लग रहा है कि इस बिंदु पर गौर किया गया है, और उम्मीद है कि भारत 2020-21 तक यूरो-6 मानक अपनाने लगेगा।

मराठा के अधीन पेशवा


मराठा एक अत्यधिक लड़ाकू/हिंसक जाति थी जिसने दक्कन क्षेत्र में शक्तिशाली संघ की स्थापना की| मुग़ल शासक औरंगजेब की मृत्यु के बाद वे राजनीति और सत्ता के केंद्र में आ गए। स्थानीय नेता शिवाजी ने 1674 ईo में स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की। उनकी प्रशासनिक प्रणाली हिन्दू और मुस्लिम संस्थाओं का मिश्रण थी। पेशवा राज की स्थापना के बाद मराठों की प्रशासनिक प्रणाली में कई परिवर्तन किये गए।
बालाजी बाजीराव (1740-1761 ईo)
माधव राव प्रथम(1761-1772 ईo) 

स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना का राजनीतिक आधार मुगल सेनाओं के दक्षिण की ओर बढने के साथ ही तैयार हो गया था खानदेश का पतन,अहमदनगर का धीरे-धीरे खत्म होते जाने और दक्कन क्षेत्र में मुगल सुबेदारी व्यवस्था ने मराठों के जीवन के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित किया और शिवाजी के नेतृत्व में मराठों को एक राष्ट्र के रूप में संगठित होने के लिए प्रेरित किया। लेकिन दुर्भाग्य से, मराठा संघ ब्रिटिश साम्राज्य के सामने टिक नहीं पाया और समाप्त हो गया।

भारत-ब्रिटेन संस्कृति वर्ष:2017

भारत और ब्रिटेन के बीच सांस्कृतिक सहलग्नताएं (Cultural Linkages) गहरी एवं व्यापक हैं जो दोनों देशों के बीच साझे इतिहास से उत्पन्न हुई हैं। ब्रिटेन में अनेक भारतीय सांस्कृतिक संगठन स्थापित हैं जो भारतीय प्रवासियों (Indian Diaspora), ब्रिटिश संगठनों एवं लोगों को शामिल कर भारतीय संस्कृति का सक्रियता से प्रचार-प्रसार कर रहें हैं। नेहरू केंद्र (Nehru Centre) ब्रिटेन में भारतीय उच्चायोग का सांस्कृतिक प्रकोष्ठ (Cultural Wing) है। वर्ष 1992 में स्थापित यह केंद्र विदेश में ‘भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद’ (ICCR) के प्रमुख सांस्कृतिक केंद्रों में से एक है। सांस्कृतिक सहयोग पर भारत और ब्रिटेन के मध्य अक्टूबर, 2014 में एक समझौता-ज्ञापन (MoU) पर भी हस्ताक्षर किए गए थे जो अक्टूबर, 2019 के अंत तक प्रभावी है।
  • वर्ष 2017 को ‘भारत-ब्रिटेन संस्कृति वर्ष’ (India-UK Year of Culture) के रूप में मनाया जा रहा है।
  • उल्लेखनीय है कि नवंबर, 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिटेन यात्रा के दौरान दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने यह घोषणा की थी कि गहरे सांस्कृतिक द्विपक्षीय संबंधों तथा भारत की स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ का जश्न मनाने के लिए वर्ष 2017 को ‘भारत-ब्रिटेन संस्कृति वर्ष’ के रूप में मनाया जाएगा।
  • भारत-ब्रिटेन संस्कृति वर्ष के उपलक्ष्य में वर्ष भर चलने वाले समारोहों की शुरुआत करने के उद्देश्य से 27 फरवरी, 2017 को लंदन स्थित बकिंघम पैलेस में महारानी एलिजाबेथ द्वितीय द्वारा एक विशेष स्वागत कार्यक्रम (Reception) का आयोजन किया गया।
  • इस समारोह में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल द्वारा किया गया।
  • संस्कृति वर्ष-2017 में दोनों देशों के वैविध्यपूर्ण सांस्कृतिक अतीत का उत्सव मनाने के लिए ब्रिटेन और भारत में विभिन्न कार्यक्रमों एवं प्रदर्शनियों का आयोजन ब्रिटिश काउंसिल, भारतीय उच्चायोग (लंदन) और ब्रिटिश एवं भारतीय संस्थानों की भागीदारी से किया जाएगा।
  • भारत-ब्रिटेन संस्कृति वर्ष के उपलक्ष्य में अक्टूबर, 2017 में 61वें लंदन फिल्म फेस्टिवल के दौरान भारत, ब्रिटेन एवं जर्मनी द्वारा संयुक्त रूप से वर्ष 1928 में निर्मित मूक फिल्म ‘शिराज’ (Shiraz) का प्रदर्शन सितार वादक अनुष्का शंकर के संगीत के मध्य किया जाएगा।
  • यह फिल्म मुगल शासक शाहजहां एवं मुमताज महल की प्रेम कहानी पर आधारित है।
  • वर्ष के अंत में यह फिल्म भारत में भी सिनेमाघरों एवं विभिन्न महोत्सवों में प्रदर्शित की जाएगी।
  • अप्रैल-दिसंबर, 2017 तक ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट (BFI) ‘इंडिया ऑन फिल्म’ (India on Film) कार्यक्रम आयोजित करेगा।
  • ‘फिल्म लंदन’ के माइक्रोवेव कार्यक्रम तथा भारतीय प्रोडक्शन हाउस ‘सिनेस्तान’ (Cines-taan) की भागीदारी में एक नई फिल्म ‘द हंग्री’ (The Hungry) का निर्माण किया गया है।
  • विलियम शेक्सपियर के नाटक ‘टाइटस एंड्रानिकस’ (Titus Andronicus) पर आधारित इस फिल्म की लेखिका एवं निर्देशिका बॉर्निला चटर्जी हैं।

साइबर स्वच्छता केंद्र

परिचय
विभिन्न क्षेत्रों में सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी की बढ़ती भूमिका एवं इंटरनेट के जरिए लेन-देन एवं डाटा के आदान-प्रदान में हो रही वृद्धि के परिप्रेक्ष्य में साइबर सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता वाले विषय के रूप में उभरा है। साइबर सुरक्षा के अभाव में महत्वपूर्ण राजनीतिक, आर्थिक, शासनिक, सामरिक एवं कूटनीतिक जानकारी एवं अन्यान्य इंटरनेट चालित उपकरण हैकिंग का शिकार हो सकते हैं और सारी सूचना अवांछित व्यक्तियों तक पहुंच सकती है। ऐसे में साइबर सुरक्षा की अपरिहार्यता को देखते हुए भारत सरकार ने ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का दायरा भौतिक स्वच्छता से बढ़ाकर ‘वर्चुअल स्वच्छता’ तक विस्तारित कर दिया है। 22 फरवरी, 2017 को इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने नेटवर्क एवं इंटरनेट प्रणालियों को मालवेयर एवं बॉटनेट से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से ‘साइबर स्वच्छता केंद्र’ बॉटनेट क्लीनिंग एवं मालवेयर विश्लेषण केंद्र का शुभारंभ किया।

विशेषताएं
  • साइबर स्वच्छता केंद्र का लक्ष्य बॉटनेट एवं मालवेयर संबंधी खतरों की जानकारी देकर एवं सुरक्षात्मक उपाय सुझाकर डिजिटल इंडिया के सूचना प्रौद्योगिकी ढांचे की साइबर सुरक्षा बढ़ाना है।
  • यह उपक्रम इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के डिजिटल इंडिया अभियान का हिस्सा है जिसका उद्देश्य सुरक्षित साइबर स्पेस का सृजन करना है।
  • साइबर स्वच्छता केंद्र बॉटनेट संक्रमण का पता लगाकर उपयोगकर्ताओं की प्रणालियों (Systems) को सुरक्षित रखेगा ताकि संक्रमण फैलने से रोका जा सके।
  • इस केंद्र का परिचालन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम-इंडिया (सीईआरटी-इन) द्वारा किया जा रहा है।
  • साइबर स्वच्छता केंद्र-बॉटनेट क्लीनिंग एवं मालवेयर विश्लेषण केंद्र द्वारा नागरिकों के लिए कुछ उपकरण (टूल्स) जारी किए गए हैं। ये उपकरण हैं-
  • यूएसबी प्रतिरोध-यह एक डेस्कटॉप सिक्योरिटी सॉल्यूशन है, जो यूएसबी मास स्टोरेज डिवाइस के खतरों से रक्षा करता है।
  • एपसंविद-यह एक डेस्कटॉप सॉल्यूशन है, जो व्हाइट लिस्टिंग के जरिए वास्तविक एप्लीकेशन को इंस्टॉल करने की सुविधा देकर प्रणालियों की रक्षा करता है।
  • इससे द्वेषपूर्ण एप्लीकेशन से होने वाले खतरों की रोकथाम करने में भी मदद मिलती है।
  • एम-कवच-यह स्वदेश में ही विकसित किया गया एक सॉल्यूशन है, जो मोबाइल में उभरने वाले सुरक्षा संबंधी खतरों का निवारण करता है।
  • यह केंद्र इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनियों एवं एंटी वायरस कंपनियों के साथ मिलकर काम करेगा इसके माध्यम से संक्रमित कंप्यूटर और उसके इंटरनेट सेवा प्रदाता को संक्रमण की स्थिति में सचेतक भेजा जाएगा।
  • यह केंद्र बैंकों को नेटवर्क सुरक्षा संबंधी सुझाव भी देगा।
  • उल्लेखनीय है कि मालवेयर, स्पाईवेयर, वार्म आदि एक प्रकार के सॉफ्टवेयर होते हैं जिनका इस्तेमाल हैकर कंप्यूटर से पर्सनल डाटा चोरी करने हेतु करते हैं। ये वायरस निजी फाइलों तक पहुंचकर उन्हें दूसरी डिवाइस में स्थानांतरित कर देते हैं जिससे लोगों की निजी सूचनाएं अवांक्षित लोगो तक पहुंच जाती है।
  • इसी प्रकार बॉटनेट सिस्टम नेटवर्क में व्यवधान उत्पन्न करने वाला एक सॉफ्टवेयर होता है जो किसी सिस्टम के परिचालन को नियंत्रित कर साइबर हमले करने में सक्षम होता है।
लाभ एवं महत्व
  • साइबर स्वच्छता केंद्र की स्थापना नेटवर्क सुरक्षा संबंधी एक महत्वपूर्ण पहल है। इससे न केवल लोगों का डिजिटल व्यवस्था में विश्वास बढ़ेगा बल्कि डिजिटल ढांचे की सुरक्षा भी सुनिश्चित होगी। साइबर सुरक्षा वर्तमान समय में सभी राष्ट्रों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती है। पिछले वर्ष संपन्न हुए अमेरिकी चुनावों में आशंकित साइबर हमला और उससे उत्पन्न विश्वसनीयता का संकट साइबर सुरक्षा के महत्व को रेखांकित करता है। भारत भी साइबर हमलों से अछूता नहीं है। अक्टूबर, 2016 में भारतीय स्टेट बैंक के 32 लाख एटीएम कार्ड हैक होने की सूचना से पूरे देश में इस बैंक के ग्राहक प्रभावित हुए थे। अतः नेटवर्क आधारित डाटा को सुरक्षित रखना न केवल सरकार की जिम्मेदारी है बल्कि सभी संगठनों का भी दायित्व है। इसके लिए साइबर स्वच्छता केंद्र सरकार एवं विभिन्न संगठनों के मध्य समन्वय पर बल देता है साथ ही साइबर खतरों से समस्त नागरिकों को सचेत करने एवं व्यापक जागरूकता कार्यक्रम प्रस्तावित करता है। साइबर स्वच्छता केंद्र के उद्घाटन के अवसर पर इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने राज्य स्तर पर कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम गठित करने एवं साइबर सुरक्षा क्षेत्र में पहल करने वाले स्टार्ट-अप्स को फीस में 50 प्रतिशत छूट देने की घोषणा की। यह डिजिटल सुरक्षा ढांचे को व्यापक बनाने में मद्दगार होगा कुल मिलाकर सूचना प्रौद्योगिकी एवं डिजिटलीकरण के वर्तमान युग में साइबर सुरक्षा केंद्र का निर्माण अत्यंत सामयिक एवं महत्वपूर्ण कदम है।

ट्रैपिस्ट-1 : जीवन की संभावना वाला एक नया सौरमंडल

ट्रैपिस्ट-1
नासा के स्पिट्जर अंतरिक्ष टेलीस्कोप द्वारा नव अन्वेषित एक सौरमंडल है जिसका नाम चिली में स्थित ‘The Transiting Planets and Planetesimals Small Telescope (TRAPPIST) के नाम पर TRAPPIST-1 रखा गया है।

अवस्थिति
  • यह पृथ्वी से लगभग 40 प्रकाशवर्ष (235 ट्रिलियन मील) दूर नक्षत्र कुंभ राशि में स्थित है।
  • ट्रैपिस्ट-1 सौरमंडल में स्थित ग्रह एवं विशेषताएं
  • इस सौरमंडल में पृथ्वी सदृश कुल सात चट्टानी ग्रह एक तारे (सूर्य) की परिक्रमा करते हैं।
  • इस सौरमंडल के सूर्य का वजन हमारे सूर्य के वजन के आठवें हिस्से के बराबर तथा आकार बृहस्पति ग्रह से थोड़ा बड़ा है।
  • हमारे सूर्य के विपरीत इस सूर्य को अल्ट्रा कूल ड्वार्फ श्रेणी में रखा गया है।
  • इस श्रेणी के तारों का औसत तापमान 2,430 डिग्री सेल्सियस होता है जो सूर्य के तापमान (5,504 डिग्री से.) के मुकाबले करीब आधा है।
  • सभी सात ग्रह (बी,सी,डी,ई,एफ,जी,एच) पृथ्वी के आकार के हैं।
  • इनमें से तीन ग्रहों (1 ई, 1 एफ तथा 1जी) पर जीवन की प्रबल संभावनाएं हैं क्योंकि ये हैबिटेबल या गोल्डीलाक जोन में स्थित हैं।
  • गोल्डीलाक जोन तारे/सूर्य से वह निश्चित दूरी होती है जहां स्थित ग्रहों का तापमान जीवन के लिए उपयुक्त होता है।
  • सातों ग्रहों का अपने तारे/सूर्य के साथ जुड़ाव इस प्रकार का है कि अपनी-अपनी कक्षाओं में परिक्रमा करते समय सभी का एक ही हिस्सा सदैव सूर्य की तरफ रहता है। इस कारण से सभी ग्रहों पर दोनों ओर या तो शाश्वत दिन होता है या रात।
  • संभावना है कि इस कारण वहां पृथ्वी जैसा मौसम चक्र नहीं होगा और दिन की ओर से रात वाले हिस्से की तरफ तेज हवाओं का चलना तथा चरम तापमान परिवर्तन पाया जाएगा।
  • ट्रैपिस्ट-1 के मेजबान तारे/सूर्य से सभी सात ग्रहों की कक्षाओं की दूरी हमारे सूर्य से बुध की कक्षा की दूरी (57,910,000 किमी.) से भी कम है।
  • सातों ग्रहों के मध्य की दूरी भी इतनी कम है कि कोई व्यक्ति एक ग्रह पर खड़े होकर दूसरे ग्रह के बादल आसानी से देख सकता है।
  • छह ग्रहों के वजन का अनुमान लगाया गया है, जबकि सातवें ग्रह 1 एच के बर्फीले होने का अनुमान है।
  • उल्लेखनीय है कि यह सभी ग्रह हमारे सौरमंडल से बाहर स्थित हैं। अतः इन्हें एक्सोप्लेनेट्स कहते हैं।
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
  • मई, 2016 में ट्रैपिस्ट के जरिए ट्रैपिस्ट-1 में तीन ग्रह होने का दावा किया गया था।
  • यूरोपीय दक्षिणी वेधशाला के बहुत बड़े टेलीस्कोप सहित कई भू-आधारित दूरबीनों द्वारा सहायता प्राप्त, स्पिट्जर, अंतरिक्ष स्थित टेलीस्कोप ने इनमें से दो ग्रहों के अस्तित्व की पुष्टि की तथा पांच अतिरिक्त ग्रहों की खोज की, जिससे ज्ञात ग्रहों की संख्या सात हो गई।
  • स्पिट्जर (अवरक्त खगोलीय दूरदर्शी) द्वारा ट्रैपिस्ट-1 पर लगाकर पांच सौ घंटे नजर रखने के बाद ग्रहों के आकार एवं दूरी का पता चला।
  • नासा अक्टूर, 2018 में जेम्स वेब टेलीस्कोप अंतरिक्ष में भेजेगा जो अंतरिक्ष में उपस्थित स्पिट्जर, केप्लर और हबल टेलीस्कोप के साथ मिलकर ट्रैपिस्ट-1 की गहन पड़ताल करेगा।
  • जेम्स वेब टेलीस्कोप पानी के रासायनिक फिंगरप्रिंट, मीथेन, ऑक्सीजन, ओजोन और ग्रहों के वायुमंडल के अन्य घटकों का पता लगाने में सक्षम होगा।
  • यह टेलीस्कोप आवास क्षमता के आकलन हेतु महत्वपूर्ण कारकों यथा ग्रहों के तापमान एवं सतह के दबावों का भी विश्लेषण करेगा।
  • उल्लेखनीय है कि इस खोज ने हमारे सौरमंडल के बाहर एकल तारे के चारों ओर पाए गए सबसे अधिक संख्या में जीवन संभावित (Habitable) ग्रहों की खोज का रिकॉर्ड स्थापित किया है।

यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम, 2017

युवा-पीढ़ी किसी भी देश के विकास का सशक्त आधार होती है, परंतु युवा शक्ति को सकारात्मकता की ओर मोड़ना भी एक चुनौती है। इसी को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा वर्ष 1985 को ‘अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष ‘घोषित किया गया था। इसके अलावा 12 अगस्त, 2010 से 11 अगस्त, 2011 तक अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष के रूप में मनाया गया। भारत को भी युवाओं का देश कहा जाता है। यहां 35 वर्ष तक की आयु के लगभग 65 करोड़ युवा हैं। इन युवाओं में सामुदायिक सेवा और मजबूत सामाजिक मूल्यों की भावना के विकास हेतु हाल ही में भारत सरकार द्वारा ‘यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम, 2017’ आयोजित किया गया है।
  • 23 फरवरी, 2017 को केंद्रीय युवा मामले और खेल राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) विजय गोयल ने नई दिल्ली में नेहरू युवा केंद्र संगठन के अंतर्गत 9वें यूथ एक्सचेंज प्रोग्राम का उद्घाटन किया।
  • इस एक्सचेंज प्रोग्राम के अंतर्गत झारखंड और छत्तीसगढ़ के जनजातीय क्षेत्रों के युवाओं ने राजधानी के विभिन्न क्षेत्रों का दौरा किया और यहां की संस्कृति और जीवन-शैली के बारे में जानकारी प्राप्त की।
  • इस कार्यक्रम के मुख्य लक्ष्य निम्न हैं-
    (i) युवाओं को सशक्त बनाना और भारत को एक वैश्विक ताकत प्रदान करना।
    (ii) युवाओं में सामुदायिक सेवा और मजबूत सामाजिक मूल्यों की भावना का विकास करना।
    (iii) शिक्षा के क्षेत्र में एक उपयोग कार्य बल, बेहतर रोजगार के लिए कौशल विकास और उद्यमिता प्रशिक्षण पर बल।
  • इस प्रोग्राम के तहत युवाओं से यह अपील की गई है कि वे किसी अच्छे कार्य का दायित्व ग्रहण करें, जो न केवल समाज की सहायता करे, अपितु उनके भीतर भी नेतृत्व के गुणों का विकास करे।
  • लगभग 250 विद्यार्थियों वाले मौजूदा बैच ने अपनी यात्रा के दौरान राष्ट्रपति से मुलाकात की।
  • ज्ञातव्य हो कि नेहरू युवा केंद्र संगठन पहले भी 8 राज्यों में सफल एक्सचेंज प्रोग्राम का आयोजन कर चुका है।
  • ध्यातव्य हो कि वर्तमान में स्वच्छ भारत अभियान से लेकर स्टॉर्ट-अप-इंडिया तक, सरकार की अनेक ऐसी पहलें हैं, जिनसे युवा लाभान्वित हो रहे हैं।

भ्रष्टाचार बोध सूचकांक, 2016

  • क्या है?
    ‘भ्रष्टाचार बोध सूचकांक’ वैश्विक स्तर पर विश्व के विभिन्न देशों में सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के स्तरों का तुलनात्मक आकलन हेतु एक महत्वपूर्ण मानक है, जो संबंधित देशों के भीतर एवं बाहर उद्यमियों एवं विश्लेषकों से प्रश्न पूछकर सर्वेक्षण विधि द्वारा तैयार किया जाता है।
  • उद्देश्य
    इस सूचकांक का उद्देश्य वैश्विक स्तर पर विश्व के विभिन्न देशों में सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के स्तरों का तुलनात्मक आकलन करना है।
  • जारीकर्ता संस्थान
    अंतरराष्ट्रीय गैर-सरकारी संगठन ‘ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल’ (Transparency International) जिसका मुख्यालय बर्लिन, जर्मनी में है, के द्वारा वर्ष 1995 से प्रति वर्ष ‘भ्रष्टाचार बोध सूचकांक’ (Curruption Perception Index-CPI) जारी किया जाता है।
  • महत्वपूर्ण बिंदु
  • ट्रांसपैरेंसी इंटरनेशनल द्वारा 25 जनवरी, 2017 को 22वां वार्षिक ‘भ्रष्टाचार बोध सूचकांक, 2016′ (CPI-2016) जारी किया गया।
  • इस सूचकांक में कुल 176 देशों और टेरिटरीज को रैंकिंग प्रदान की गई है।
  • यह सूचकांक 0 से 100 अंकों तक विस्तारित है जिसमें 0 का अर्थ ‘सर्वाधिक भ्रष्ट’ (Highly Currupt) और 100 का अर्थ ‘सर्वाधिक ईमानदार’ (Veryctean) होने से है।
  • इस सूचकांक में शामिल 176 देशों में दो-तिहाई देशों ने 50 अंक से कम का स्कोर प्राप्त किया है, जो इन देशों में सार्वजनिक भ्रष्टाचार की व्यापकता को प्रदर्शित
  • करता है।
  • इस सूचकांक में किसी भी देश को पूर्णतः भ्रष्टाचार मुक्त होने जैसा स्कोर नहीं मिला है अर्थात कोई भी देश भ्रष्टाचार सूचकांक में 100 अंक का स्कोर अर्जित नहीं कर सका है।
  • इस सूचकांक में डेनमार्क और न्यूजीलैंड दोनों ही 90 अंकों के साथ संयुक्त रूप से प्रथम स्थान पर हैं।
  • गत वर्ष भी डेनमार्क 91 अंकों के साथ प्रथम स्थान पर था।
  • इस सूचकांक में फिनलैंड, स्वीडन एवं न्यूजीलैंड क्रमशः 89, 88 एवं 86 अंकों के साथ तीसरे, चौथे एवं पांचवें स्थान पर हैं।
  • गत वर्ष की भांति इस वर्ष भी सूचकांक में जर्मनी, लक्जमबर्ग एवं युनाइटेड किंगडम संयुक्त रूप से 10वें स्थान पर हैं और इनमें प्रत्येक ने 81 अंक अर्जित किए हैं।
  • इस सूचकांक में सर्वाधिक 10 अंकों की कमी कतर में आई है अर्थात इस देश में भ्रष्टाचार बढ़ा है जबकि सूचकांक में सर्वाधिक 9 अंकों की वृद्धि सुरीनाम में हुई है जो इस बात का सूचक है कि इस देश में भ्रष्टाचार घटा है।
  • इस सूचकांक में केवल 10 अंक प्राप्त कर सोमालिया अंतिम स्थान (176वें) पर है।
  • 14 अंकों के साथ यमन, सूडान एवं लीबिया संयुक्त रूप से 170वें स्थान पर हैं।
सबसे कम भ्रष्टाचार वाले 5 देशसर्वाधिक भ्रष्टाचार वाले 5 देश
रैंकदेशस्कोर
2016
स्कोर/रैंक
2015
रैंकदेशस्कोर
2016
स्कोर/रैंक
2015
1डेनमार्क9091 (1)176सोमालिया10167-8
1न्यूजीलैंड9088(4)175दक्षिणी सूडान11163-15
3फिनलैंड8990(2)174उत्तर कोरिया12167-8
4स्वीडन8889(3)173सीरिया13154-18
5स्विट्जरलैंड8686(7)170यमन14154-18
  • इस सूचकांक में भारत को चीन-ब्राजील एवं बेलारूस के साथ संयुक्त रूप से 79वीं रैंक हासिल हुई है। इन सभी 4 देशों का सूचकांक स्कोर 40 है।
    सूचकांक के अनुसार, गत वर्ष की तुलना में इस वर्ष भारत के स्कोर में 2 अंकों का सुधार हुआ है जबकि रैंकिंग में 3 अंकों की कमी हुई है।
    गत वर्ष के सूचकांक में भारत 38 अंक के स्कोर के साथ बोस्निया, हर्जेगोविना, बुर्किनाफासो, थाईलैंड, ट्यूनीशिया, जाम्बिया एवं ब्राजील के साथ संयुक्त छ रूप से 76वें स्थान पर था।
    इस सूचकांक में ‘ब्रिक्स’ (BRICS) देशों की स्थिति निम्न है-
    ब्राजील-40 अंक (79वीं रैंक), रूस-29 अंक (131वीं रैंक), चीन-40 अंक (79वीं रैंक) तथा दक्षिण अफ्रीका-45 अंक (64वीं रैंक) एवं भारत-40 अंक (79वीं रैंक)
    भारत व पड़ोसी देशों की स्थिति-
रैंकदेशस्कोरस्कोररैंक
201620162015
27भूटान656527
95श्रीलंका363783
95मालदीव36N/A
79भारत403876
116पाकिस्तान3230117
145बांग्लादेश2625139
169अफगानिस्तान1511166
79चीन403783
131नेपाल2927130
136म्यांमार2822147

Current Affairs in Hindi (भाग-34)

सुप्रीम कोर्ट ने 1 अप्रैल से BS-III वाहनों की बिक्री पर लगाई रोक।

बीएस के मायने एमिशन स्टैंडर्ड से है। बीएस यानी भारत स्टेज से पता चलता है कि आपकी गाड़ी कितना प्रदूषण फैलाती है। बीएस के जरिए ही भारत सरकार गाड़ियों के इंजन से निकलने वाले धुएं से होने वाले प्रदूषण को रेगुलेट करती है। बीएस मानक सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड तय करता है। देश में चलने वाली हर गाड़ियों के लिए बीएस का मानक जरूरी है।
देश में चिंताजनक स्तर तक बढ़ चुके वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए भारत सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए बीएस-5 के बजाय अप्रैल 2020 तक बीएस-6 उत्सर्जन मानकों को लागू करने का निर्णय लिया है। भारत में अभी कारें बीएस-4 उत्सर्जन मानकों पर चलती हैं। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरकार ने इसके लिए कुछ समय पहले ही अंतिम तारीख 2021 की तय की थी और अब इसे एक साल पहले ही लागू करने का निर्णय लिया गया है। इससे पहले सरकार द्वारा गठित समिति ने 2024 से बीएस-6 मानकों को लागू किए जाने की सिफारिश की थी।
फिलहाल पूरे उत्तर भारत में बीएस-4 ईंधन की आपूर्ति होती है, जबकि देश के अन्य हिस्सों में अब भी भारत स्टेज-3 ग्रेड का ही इस्तेमाल हो रहा है। पूरे भारत में भारत स्टेज-4 मानक 2017 से लागू करने का सरकार का प्रस्ताव था। अब सरकार ने निर्णय लिया है कि स्टेज 5 को अपनाने के बजाय भारत सीधे स्टेज-6 को अपनाएगा। भारत स्टेज-6 यूरो-6 उत्सर्जन मानकों के बराबर है।
सरकार द्वारा भारत स्टेज-5 को छोड़ 2020 से सीधे भारत स्टेज-6 मानक लागू करने के निर्णय का एक बड़ा कारण यह भी है कि भारत स्टेज-5 और भारत स्टेज-6 ईंधन में सल्फर की मात्रा बराबर होती है। जहां भारत स्टेज-4 ईंधन में 50 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) सल्फर होता है, वहीं भारत स्टेज-5 व 6 दोनों तरह के ईंधनों में सल्फर की मात्रा 10 पीपीएम ही होती है।